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‘मां, मेरी बच्ची को जिंदा दो...’, चमत्कार की आस में मंदिर पहुंचा बेबस, सिसकियां सुन रो पड़े लोग
Sambhal Tragedy: संभल जिले के मौलागढ़ गांव में शुक्रवार सुबह एक बेहद दर्दनाक और दिल दहला देने वाली घटना सामने आई, जिसने पूरे इलाके को शोक में डुबो दिया।
Sambhal Tragedy
Sambhal Tragedy: उत्तर प्रदेश के संभल जिले के मौलागढ़ गांव में शुक्रवार सुबह एक बेहद दर्दनाक और दिल दहला देने वाली घटना सामने आई, जिसने पूरे इलाके को शोक में डुबो दिया। चार महीने की मासूम बच्ची की मौत के बाद उसके पिता ने जिस तरह अपनी बेबसी और उम्मीद के बीच संघर्ष किया, वह हर किसी को भावुक कर गया।
गांव के निवासी विजेंद्र की चार माह की बेटी प्रियांशी को गुरुवार शाम अचानक तेज बुखार आया था। परिवार वाले उसे दवा दिलाकर घर ले आए, लेकिन रात भर में उसकी हालत बिगड़ती चली गई। शुक्रवार सुबह जब उसे अस्पताल ले जाया जा रहा था, तभी रास्ते में ही उसकी सांसें थम गईं। बेटी की मौत को स्वीकार कर पाना विजेंद्र के लिए असंभव था। वह सीधे बच्ची को गोद में लेकर गांव के देवी मंदिर पहुंच गया।
मंदिर पहुंचकर उसने अपनी बेटी को मां के चरणों में रख दिया और बार-बार प्रार्थना करने लगा, “मां, मेरी बच्ची को जिंदा कर दो।” उसकी करुण पुकार और टूटती आवाज ने वहां मौजूद हर व्यक्ति को झकझोर दिया। मंदिर परिसर में सिसकियों की आवाज गूंजने लगी और देखते ही देखते वहां ग्रामीणों की भीड़ जुट गई। हर कोई उसे समझाने की कोशिश करता रहा कि अब बच्ची इस दुनिया में नहीं रही, लेकिन एक पिता का दिल इस सच्चाई को स्वीकार करने को तैयार नहीं था।
काफी देर तक यह सिलसिला चलता रहा। अंततः ग्रामीणों के समझाने पर विजेंद्र ने भारी मन से बच्ची के अंतिम संस्कार के लिए सहमति दी। इस दौरान वह खुद को कोसता रहा और बार-बार अपनी ही गलती बताता रहा। वह रोते हुए कहता रहा कि अगर वह बच्ची को बाहर न ले जाता तो शायद वह आज जिंदा होती। दर्द और पछतावे में डूबा वह खुद को “हत्यारा” तक कहने लगा।
विजेंद्र का दर्द यहीं खत्म नहीं होता। उसने इससे पहले भी अपने तीन बच्चों को खो दिया है एक बेटी जन्म के तुरंत बाद, दूसरी पांच दिन में और बेटा एक महीने के भीतर ही चल बसा था। बार-बार उजड़ते इस आंगन ने उसे पूरी तरह तोड़ दिया है। गरीबी में जीवनयापन करने वाले विजेंद्र का परिवार चौकीदारी और फल बेचकर गुजर-बसर करता है। इस घटना के बाद पूरे गांव में मातम पसरा हुआ है। हर गली और चौपाल पर यही चर्चा है कि ऐसी पीड़ा किसी को न मिले।


