Bihar Election 2025: बिहार विधानसभा चुनाव में न तलाशें राकेट साइंस, तीन में जो दो दल होंगे साथ, उनकी होगी सरकार

Bihar Assembly Election 2025: बिहार में अब तक सत्रह चुनाव हो चुके हैं। इस साल अठारहवाँ विधानसभा चुनाव बिहार में होने वाला है। ऐसे में सभी दलों ने अपनी कमर कस ली है।

Yogesh Mishra
Published on: 16 Aug 2025 4:35 PM IST (Updated on: 14 Nov 2025 11:32 AM IST)
Bihar Assembly Election Poll Survey NDA vs MGB RJD JDU BJP Congress Votes in Bihar Mein Kiski Ban Rahi Sarkar
X

Bihar Assembly Election 2025 Poll Survey NDA vs MGB

Bihar Assembly Election 2025 Poll Survey: वैसे तो बिहार चुनाव को लेकर राजनीति पंडित अलग अलग समीकरण बिठाते और बताते नज़र आ रहे हैं। चुनाव ख़त्म होने तक नज़र आयेंगे भी। कोई जातियों का समीकरण बिठा कर किसी गठबंधन के जीत का अनुमान पेश करेगा तो कोई हार जीत की भविष्यवाणी कर बैठेगा। पर बिहार के चुनाव के बारे में किसी ‘ राकेट साइंस’ की बात करना सही नहीं होगा।बीते तीन चार चुनावों के नतीजे पर नज़र दौड़ाएँ तो मोटे तौर पर बिहार में तीन राजनीति दल- भाजपा, जेडीयू जो और राजद हैं। ये तीनों और बाक़ी छोटे दलों में जोड़ तोड़ के बाद दो गठबंधन सामने आते हैं। पहला, एनडीए गठबंधन । दूसरा, राजद की अगुवाई में महागठबंधन । पिछले नतीजे बताते हैं कि मुख्य तीन दलों में से कोई दो दल एक साथ आ जाएँ तो उनकी सरकार बन जायेगी। बिहार में अब तक सत्रह चुनाव हो चुके हैं। इस साल अठारहवाँ विधानसभा चुनाव बिहार में होने वाला है। सभी दलों की तैयारियाँ ‘सर’ के चौसर पर तेज़ी होती हुई देखी जा सकती हैं।

वर्ष 2020 के चुनावी नतीजों पर नज़र दौड़ायें तो इस चुनाव में जेडीयू व भाजपा ने एनडीए गठबंधन के साथ चुनाव लड़ा चा। जीतन राम मांझी की ‘हम’ और साहनी की ‘वीआईपी पार्टी’ भी इस गठबंधन का हिस्सा थी। इस चुनाव में भाजपा को 77, जेडीयू को 45 और ‘हम’ व ‘वीआईपी पार्टी’ को 4-4 सीटें मिली थीं। इस गठबंधन को 37.3 फीसदी वोट हासिल हुए थे। जबकि राजद की अगुवाई वाले महागठबंधन को 37.2 फीसदी वोट मिले पर वह 243 सदस्यों की विधानसभा में बहुमत से बहुमत से 12 सीटें पीछे रह गयी। इस चुनाव में राजद को 75 , कांग्रेस को 19 और वामदलों को 16 सीटें हासिल हुई थीं।


इसके बाद के 2015 के चुनावी नतीजों पर नज़र दौड़ाई जाये तो भी कुछ यही नतीजा हाथ लगाया है। इस चुनाव में नीतीश कुमार ने राजद का साथ देने का फ़ैसला किया। वह महागठबंधन के हिस्सा बन बैठे। नतीजतन, इस गठबंधन को 41.91 फीसदी वोट हाथ लगे। इसी के साथ राजद को 80 जेडीयू को 71 व कांग्रेस को सीटें 27 मिलीं। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री व तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री बने। जबकि एनडीए गठबंधन को 34.1 फ़ीसदी वोट तथा भाजपा को 53 और लोजपा को 21 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा।

वर्ष 2010 के चुनावी नतीजों पर नज़र डाली जाये तो उससे भी कुछ इसी तरह के नतीजे निकलते हैं। इस चुनाव में नीतीश कुमार भाजपा गठबंधन के साथ एनडीए का हिस्सा थे। इसमें एनडीए गठबंधन को 206 सीटें हासिल हुई। जिसमें जेडीयू के हिस्से 115 व भाजपा के हिस्से 91 सीटें आईं। जबकि महागठबंधन के दल राजद को 22 लोजपा को 3 और कांग्रेस के हाथ केवल 4 सीटें लगीं।

वर्ष 2005 में बिहार में विधानसभा के दो चुनाव हुए। पहला चुनाव फ़रवरी 2005 में हुआ। पर इस चुनाव में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। बिहार के मतदाताओं ने त्रिशंकु विधानसभा का जनादेश दिया। यह जनादेश इतना खंडित था कि किसी की सरकार नहीं बनीं। राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा। इस चुनाव में एनडीए गठबंधन बहुमत से थोड़ा दूर रह गया। इस गठबंधन के दल भाजपा को 37 जेडीयू 55 को और लोजपा को 29 सीटें मिलीं। जबकि राजद को 75 और कांग्रेस को 10 सीटें हाथ लगीं। बसपा को दो, सीपीआई को तीन, सीपीएम को एक, एनसीपी को तीन, सपा को चार एमएल को सात और सत्रह निर्दलीय विधायक जीतने में कामयाब हुए।


राष्ट्रपति शासन के बाद अक्टूबर- नवंबर 2005 में फिर चुनाव हुए। इसमें एनडीए को स्पष्ट बहुमत से काफ़ी अधिक यानी 143 सीटें हाथ लगीं। इसमें जेडीयू के खाते में 88 और भाजपा के खाते में 55 सीटें गई। इसमें राजद को 54 , लोजपा को 10 , कांग्रेस को 9 सीटों पर संतोष करना पड़ा।

बिहार में अब तक 17 विधानसभा चुनाव वर्ष—1952, 1957, 1962, 1967, 1969 (मध्यावधि), 1972, 1977, 1980, 1985, 1990, 1995, 2000, फ़रवरी-2005, अक्तूबर-2005, 2010, 2015 और 2020 में हुए। 1952सो 1985 के बीच कांग्रेस का वर्चस्व रहा। 1967 से 72 में गठबंधन-राजनीति परवान चढ़ी। 1977 में जनतापार्टी की लहर चली। 1990 से 2005 के बीच में जनता दल/RJD के नेतृत्व वाला मंडल-युग की गाथा गाता दिखा। 2005 के बाद से मुख्यतः NDA बनाम MGB का द्विध्रुवीय मुक़ाबला हुआ। इसी उतार-चढ़ाव ने बिहार की सरकारें तय कीं।

1952 के पहले चुनाव में मुख्य मुकाबला कांग्रेस बनाम समाजवादी/झारखंड पार्टी व स्वतंत्र प्रत्याशी के बीच रहा। कांग्रेस को 41.38 फीसदी वोट और 239सीटों वाली विधानसभा में 330 सीटें मिलीं। झारखंड पार्टी (JKP) को 8 फीसदी वोट और 32 सीटें हासिल हुई। सरकार कांग्रेस की बनीं। और श्रीकृष्ण सिंह मुख्यमंत्री बने।

1957 में कांग्रेस फिर सबसे आगे रही। उसे 42.09 फीसदी वोट और 210 सीटें हाथ लगीं। प्रजा समाजवादी पार्टी (PSP) को केवल 16 फीसदी वोट हाथ लगे। जबकि 31 सीटों पर इसके उम्मीदवार जीते। झारखंड पार्टी को 7.1 फीसदी वोट और 31 विधायक मिले। CPI को 5.15 फीसदी वोट और 7 सीटें मिलीं। सरकार कांग्रेस की बनी। फिर मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह बने।

1962 में कांग्रेस को 41.35 फीसदी वोट और 185 सीटें हासिल हुई। उस समय विधानसभा में कुल विधायकों की संख्या 318 थी।विपक्ष में स्वातंत्र्य पार्टी को 17.25 फीसदी वोट और 50 सीट मिलीं। जबकि पीएसपी को 14.17 फीसदी वोट तथा 29 सीटें हाथ लगीं। CPI को 6.23फीसदी वोट व 12 सीटें मिलीं। जनसंघ को 2.77 फीसदी वोट तथा 3 विधायक मिले। झारखंड पार्टी को 4.39 फीसदी वोट व 20 विधायक जीतने में कामयाब हुए। सरकार कांग्रेस की बनीं। मुख्यमंत्री बिनोदानंद झा को बनाया गया। बाद में के.बी. सहाय मुख्यमंत्री बने।


1967 में बहुदलीय/विखंडित जनादेश आया। कांग्रेस को 33.09 फीसदी वोट तथा 128 सीटें हाथ लगीं। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के हिस्से 17.62 फीसदी वोट और 68 विधायक आये। जबकि जनसंघ के हिस्से 10.42 फीसदी वोट तथा 26 विधायक आये। पीएसपी को 6.96 फीसदी वोट व 18 विधायक मिले। CPI को 6.91 फीसदी वोट व 24 विधायक हाथ लगे। संयुक्त विधायक दल की सरकार बनी। महामाया प्रसाद सिन्हा मुख्यमंत्री बने । पर बाद में बीपी मंडल तथा भोला पासवान शास्त्री को भी मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला।

1969 में मिड-टर्म चुनाव हुआ। इस चुनाव में कांग्रेस(R) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। इसे 30.46 फीसदी वोट और 118 सीटें हाथ लगीं।एसएसपी को 13.68 फीसदी वोट व 52 विधायक मिले। जबकि जनसंघ को 15.63 फीसदी वोट तथा 34 विधायक हाथ लगे। CPI को 10.10 फीसदी वोट व 25 विधायक, PSP को 5.64 फीसदी वोट तथा 18 विधायक हाथ लगे। आरम्भ में सरकार कांग्रेस की बनी। हरिहर सिंह मुख्यमंत्री बने।फिर अस्थिरता ने इस सरकार को घेर लिया।

1972 में इमरजेंसी के पूर्व चुनाव में कांग्रेस(R) को 33.12 फीसदी वोट तथा 167 विधायक हाथ लगे। CPI को 6.94 फीसदी वोट व 35 विधायक, SSP/सोशलिस्ट तो 16.39 फीसदी वोट व 33 विधायक, कांग्रेस(O) को 14.82 फीसदी वोट तथा 30 विधायक, जनसंघ को 11.69 फीसदी वोट तथा 25 विधायक हाथ लगे। सरकार कांग्रेस की बनीं। पहले केदार पांडे पर बाद में अब्दुल गफूर तथा उसके बाद जगन्नाथ मिश्र बिहार के मुख्यमंत्री बने।

1977 में आपातकाल के बाद जनता लहर चली। इस लहर में जनता पार्टी को 42.7 फीसदी वोट और 214 विधायक हाथ लगे। कांग्रेस को 23.6 फीसदी वोट तथा 57 विधायक मिले। CPI को 7 फीसदी वोट और 21 विधायक हाथ लगे। सरकार जनता पार्टी की बनी। कर्पूरी ठाकुर को मुख्यमंत्री बनाया गया। उसके बाद में रामसुन्दर दास मुख्यमंत्री बने।

1980 के चुनाव में कांग्रेस ने वापसी की। उसे 34.20 फीसदी वोट और 169 सीटें हाथ लगीं। उस समय बिहार विधानसभा की संख्या 324 विधायकों की थी।जनता पार्टी (सेक्युलर) को 15.6 फीसदी वोट और 46 सीट सीटें मिल गईं। जबकि CPI को 9.12 फीसदी वोट तथा 23 विधायक हाथ लगे। भाजपा को केवल 8.41 फीसदी वोट मिले पर 21 विधायक उसके जीतने में कामयाब हुए। सरकार कांग्रेस की बनी। जगन्नाथ मिश्र फिर बिहार के मुख्यमंत्री बने। पर बाद में चन्द्रशेखर सिंह को मुख्यमंत्री बनाया गया।


1985 में कांग्रेस का बड़ा बहुमत आया। उसे 39.30 फ़ीसदी वोट और 196 सीटें जीतने में कामयाबी मिली। लोकदल को 14.69 फीसदी वोट व 46 सीटें हाथ लगीं। जबकि CPI को 8.86 फीसदी वोट तथा 12 विधायक मिले। BJP को 7.54 फीसदी वोट व 16 विधायक मिले। जनता पार्टी को केवल 7.21 फीसदी वोट व 13 विधायक हाथ लगे। सरकार कांग्रेस की बनी। विंदेश्वरी दुबे मुख्यमंत्री बने। बाद में भगवत झा आजाद, एस.एन. सिंह एवं जगन्नाथ मिश्र को मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला।

1990 में मंडल-युग की शुरुआत हुई। जनता दल को 25.61 फीसदी वोट के साथ 122 विधायकों जीताने में कामयाबी हासिल हुई । कांग्रेस के खाते में 24.78 वोट व केवल 71 विधायक आये। जबकि BJP को केवल 11.61 फीसदी वोट व 39 विधायकों को जीताने में कामयाबी मिली। हालाँकि CPI के केवल 6.6 फीसदी वोट व 23 विधायक जीते। JMM को इस चुनाव में केवल 3.1 फीसदी वोट मिले। पर उसको 19 विधायक जीतने में कामयाब हुए। इस चुनाव में बिहार में लालू युग की शुरुआत हुई। सरकार जनता दल की बनी। मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव बन बैठे।

1995 के चुनाव में भी जनता दल सबसे आगे रहा। उसे 167 सीटें हाथ लगीं। जनता दल के पक्ष में 32.5 फीसदी वोट पड़े। जबकि BJP के 41 तथा कांग्रेस के 29 विधायक जीतने में कामयाब हुए। भाजपा के पक्ष में 13 फीसदी और कांग्रेस के पक्ष में 16.3 फीसदी वोट पड़े।सरकार जनता दल की बनी। लालू फिर मुख्यमंत्री बने। लेकिन 1997 से राबड़ी देवी (RJD) ने कार्यभार संभाला।


2000 में त्रिशंकु विधानसभा का जनादेश बिहार के मतदाताओं ने सुनाया। राजद को 28.34 फीसदी वोट तो मिले। पर उसे 124 सीटें ही हाथ लगीं। भाजपा को 14.64 फीसदी वोट मिले पर उसके 67 विधायक जीतने में कामयाब हुए। समता पार्टी के खाते में 8.65 फीसदी वोट और 34 विधायक आये।कांग्रेस के हाथ 11.06 फीसदी वोट तथा 23 विधायक लगे। थोड़े समय के लिए नीतीश कुमार (समता/NDA) मुख्यमंत्री बने। बाद में बहुमत न मिलने पर राबड़ी देवी (RJD) ने शासन चलाया। लेकिन इसके बाद से बिहार में नीतीश का परचम लहरा रहा है। वो जिस दल के साथ होते हैं, उसी की सरकार बनती आ रही है। देखना है बिहार के आगामी चुनाव में सह फार्मूले कितना काम आता हैं।

1 / 8
Your Score0/ 8
Yogesh Mishra
ABOUT THE AUTHOR

Yogesh Mishra

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

Next Story