TRENDING TAGS :
Bihar Chunav 2025: एनडीए सीट बंटवारे का निर्णय और जो कुछ चल रहा
Bihar NDA Seat Sharing Analysis Report: बिहार के विधानसभा चुनाव के लिए एनडीए ने गठबंधन दलों को उनके हिस्से की सीट देकर इस बात का ऐलान कर दिया है कि इस गठबंधन में सब कुछ ठीक ठाक चल रहा है।
Bihar Chunav 2025 Latest Update NDA Seat Sharing
Bihar NDA Seat Sharing Analysis Report: बिहार के विधानसभा चुनाव के लिए एनडीए ने गठबंधन दलों को उनके हिस्से की सीट देकर इस बात का ऐलान कर दिया है कि इस गठबंधन में सब कुछ ठीक ठाक चल रहा है। पर यह सही नहीं है।चिराग़ पासवान को दी गई सीटों को लेकर भाजपा व जेडीयू के नेता ही सवाल खड़ा कर रहे हैं। पिछली बार चिराग़ पासवान का स्ट्राइक रेट केवल एक फीसदी था।उन्हें 5.66 फीसदी यानी 27.2 लाख वोट ही हासिल हुए थे। यह बात दीगर है कि जब भाजपा के साथ मिलकर चिराग बीता लोकसभा लड़े तब उन्हें 6.8 फीसदी यानी 52.7 लाख वोट हासिल हुए। उन्हें सभी पांचों उम्मीदवार जीतने में कामयाब हुए। लेकिन भाजपा व जदयू के नाक इस जीत का श्रेय चिराग़ को नहीं भाजपा व एनडीए गठबंधन का हिस्सा बनने को देते हैं। भाजपा व जदयू ख़ेमे में पिछली बार से कम सीटों पर चुनाव लड़ने को लेकर पसरे असंतोष को भी पढ़ा जा सकता है।
भाजपा नेताओं का यह दावा भी है कि पिछली बार जदयू से उनका स्ट्राइक रेट बेहतर था फिर भी जदयू के बराबर सीटें लड़ने का फ़ैसला उन्हें हैरान करने वाला है। इस बार भी नीतीश कुमार के स्ट्राइक रेट के ख़राब होने की अटकलें तेज हैं। क्योंकि सरकार के मंत्रियों के खिलाफ जनता का ग़ुस्सा सड़क पर देखा गया है।
बिहार। रकार के ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार और एक स्थानीय विधायक को अगस्त 2025 में, ग्रामीणों ने लगभग 1 किलोमीटर तक पीछे तक पीछा किया।इस दौरान उनकी गाड़ी पर हमला हुआ, सुरक्षा अधिकारी घायल हुए और मंत्री को कई बार वाहन बदलना पड़ा।
2021 में, मदन साहनी और बीजेपी के श्रम मंत्री जिवेश मिश्रा के बीच सार्वजनिक लड़ाई (मुफ़्त बयानबाज़ी) हुई थी। इस दौरान साहनी ने मिश्रा को “दलाल” कह दिया था। यह मामला मंत्री स्तर की गंभीर कलह का प्रतीक बना, और जनता व सियासी दल दोनों में ही चर्चा छिड़ गई। 31 अगस्त, 2024 को, एक व्यक्ति ने सार्वजनिक कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह को पंच मारने की कोशिश की। उन्होंने माइक्रोफोन छीना और हमला करने की हालत बनाई। यह घटना बिहार में हुई थी और इसे ‘जनता का आक्रोश’ माना गया।
सीट बंटवारे की घोषणा और मुख्य बिंदु
एनडीए ने बिहार विधानसभा चुनावों के लिए सीट बंटवारा तय कर लिया है: बीजेपी और जेडीयू प्रत्येक 101 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। इसके अलावा, चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को 29 सीटें दी गईं। छोटे घटक दलों हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (HAM-Secular) और राष्ट्र लोक मोर्चा (RLM) को 6-6 सीटें आवंटित की गई हैं।
केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि यह बंटवारा सौहार्दपूर्ण तरीके से किया गया और सभी एनडीए घटक दलों ने संतोष व्यक्त किया है। यह पहली बार है जब बीजेपी और जेडीयू बराबर की संख्या में सीटें लड़ेंगे, जिससे दोनों दलों की समता का संकेत मिलता है।
संतुष्टि, असंतोष और दबाव
चिराग पासवान को 29 सीटें मिलने से वे इस बंटवारे में मुख्य लाभार्थी बने। जीतन राम मांझी (HAM-Secular), जिनकी पार्टी के पास 4 विधायक और 1 सांसद है, उन्हें अपेक्षा से कम सीटें मिली हैं। उन्हें भी उतनी ही सीटें दी गई हैं जितनी RLM को, यानी 6 सीटें, जो कि उनकी मांगों के अनुरूप नहीं बताई जा रही।
उपेंद्र कुशवाहा (RLM) को 6 सीटों की हिस्सेदारी मिली है, जो कुछ लोगों का कहना है कि अपेक्षा से कम है, लेकिन गठबंधन समीकरण को ध्यान में रखकर किया गया बंटवारा माना जा रहा है। एक बीजेपी नेता ने स्वीकार किया है कि “LJP को ज़रूरी से ज़्यादा सीटें दी गई हैं … गठबंधन को बचाने के लिए हमने इसे स्वीकार किया।” जेडीयू ने तुरंत प्रतिक्रिया दी है कि “फिर एक बार नीतीश सरकार” को लेकर उनका दावा कायम रहेगा, यानी मुख्यमंत्री चेहरे की दावेदारी पर वे अभी भी अड़ान पर हैं।
रणनीति आगे की
एनडीए का कदम यह दिखाता है कि बीजेपी ने जेडीयू को बराबरी की स्थिति देने की कोशिश की है ताकि दोनों की साझेदारी में टकराव कम हो।लेकिन चिराग को 29 सीट देना इस बात का संकेत भी है कि बीजेपी उन्हें सहयोगी के रूप में अधिक महत्व देना चाहता है — ताकि वे गठबंधन में मजबूती लाएँ।छोटे दलों (HAM, RLM) के साथ संतुलन बनाए रखना एक चुनौती है — उन्हें थोड़ा इंसाफ़ मिला है, लेकिन वे पूरी संतुष्टि नहीं दिखा रहे हैं।आगे, उम्मीदवारी सूची, जातीय समीकरण, लिंग प्रतीनिधित्व, और चुनावी रणनीति जैसे विषयों पर घनिष्ठ बातचीत जारी रहेगी।यदि किसी घटक दल ने नाराजगी जाहिर की तो अत्यंत सावधानी से इसका प्रबंधन करना होगा, क्योंकि किसी भी बगावत से एनडीए को आघात हो सकता है।
महागठबंधन / INDIA ब्लॉक: सीट बंटवारे की जटिलता और बाधाएँ
बंटवारे में खींचतान और नई गतियाँ
महागठबंधन (INDIA ब्लॉक) में RJD, कांग्रेस, वाम दलों के बीच सीट बंटवारा अभी भी तय नहीं हुआ है, क्योंकि कांग्रेस ने 52 सीटों की पेशकश को अस्वीकार कर 60 सीटों की मांग की है।
RJD नेता ने यह टिप्पणी की कि क्या कांग्रेस को 76 सीटें देनी हैं सिर्फ इसलिए कि वे चुनाव हारें? ऐसा कहना गठबंधन के भीतर अनबन का संकेत है।
लालू यादव और तेजस्वी यादव दिल्ली गए हैं ताकि राहुल गांधी के हस्तक्षेप और एकरूपता लाने में मदद मिल सके।
कांग्रेस का रवैया शिकायतों से भरा है — कई फ्रंटल सवाल कांग्रेस को संतुष्ट नहीं कर पा रहे हैं।
दूसरी ओर, एक सहयोगी दल झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने कहा है कि यदि उन्हें “सम्मानजनक सीटें” नहीं मिलती हैं, तो वे ब्लॉक से अलग हो सकते हैं — उन्होंने कम से कम 12 सीटों की मांग की है।
RJD से मृत्यंजय तिवारी ने कहा:
“यह साफ है कि सभी ठीक नहीं है एनडीए में। उन्होंने JDU को ‘बड़ा भाई’ की भूमिका से बराबरी पर ला दिया है। बीजेपी 130 सीटों की मांग कर रही है। चुनाव के बाद JDU को खत्म कर मुख्यमंत्री की सीट ले लेगी।”
कांग्रेस की ओर से, उनका कहना है कि उन्हें कम सीट देने की पेशकश स्वीकार नहीं है — उन्होंने ज़्यादा हिस्सेदारी मांगी है। RJD के वरिष्ठ नेता ने यह भी कहा कि गठबंधन की मजबूती और जीत ही प्राथमिकता है, सीटों को लेकर जटिलताएँ समय रहते सुलझ जाएँगी।
रणनीति आगे की
RJD इस बात पर बल दे रहा है कि सीट बंटवारा जल्द हो ताकि प्रचार अभियान समय पर चल सके।कांग्रेस अपनी मांगों पर अटकी हुई है — यदि वह ज़्यादा सीटें न प्राप्त करे तो असंतोष बढ़ सकता है, जिससे गठबंधन में दरार आ सकती है।वाम दल और अन्य सहयोगी यह देख रहे हैं कि छोटे दलों को किस हद तक हिस्सेदारी मिलेगी — अगर उन्हें कम भागीदारी मिले तो वे समर्थन दरकिनार कर सकते हैं। JMM का दबाव एक अल्टीमेटम के रूप में सामने आ गया है — यदि अपेक्षानुसार हिस्सेदारी नहीं मिली, तो वे गठबंधन से बाहर निकल सकते हैं।यदि साथी दलों की नाराजगी बढ़ी, तो RJD-कांग्रेस को दिल्ली में उच्चस्तरीय समझौतों एवं हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ेगी।अंतिम बंटवारे का समय कम है और नामांकन तिथि नज़दीक है, इसलिए दलों को जल्दी से जल्दी सहमति पर पहुंचना होगा।
कहाँ फँसा पेंच और आगे क्या सम्भावनाएँ?
एनडीए ने बंटवारा तय कर लिया है, लेकिन कई छोटे घटक दलों में पूर्ण संतुष्टि नहीं दिखती।महागठबंधन में अभी बहुत खींचतान और अनिश्चयता है — सीटों के विभाजन को लेकर अंदरुनी दबाव बढ़ गया है।यदि कांग्रेस अपनी मांग पूरी न कर पाए, तो गठबंधन में क्रिसिस पैदा हो सकती है।JMM जैसी पार्टियों की धमकियाँ दिखाती हैं कि यदि हिस्सेदारी निष्पक्ष नहीं हुई, तो गठबंधन में टूट की संभावना है।अगली रणनीति यह होगी कि दोनों मोर्चे — NDA और महागठबंधन — नामांकन की तैयारी, प्रचार अभियान, और संपर्क-प्रचार योजनाएँ तेजी से शुरू करें।
साथ ही, दलित, पिछड़ा, जातीय समीकरण, जमीनी नेताओं की मांगें, और परिचय गढ़ने की चुनौती इन सभी को मिलाकर हिसाब-साथ करना होगा।अंततः, यह देखा जाना है कि किस गठबंधन की समन्वय क्षमता और रणनीति बेहतर सिद्ध होती है।


