बिहार की चुनावी 'नब्ज'! क्या बाहुबल के बिना जीत मुमकिन है?

Bihar's election 2025: क्या बिहार की राजनीति कभी धनबल और बाहुबल से मुक्त हो पाएगी? जानिए पूरी रिपोर्ट।

Gausiya Bano
Published on: 3 Nov 2025 8:43 AM IST (Updated on: 3 Nov 2025 9:41 AM IST)
बिहार की चुनावी नब्ज! क्या बाहुबल के बिना जीत मुमकिन है?
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Bihar's election 2025: बिहार की गलियों में इस वक्त सिर्फ सियासत की हवा नहीं बह रही, बल्कि उसमें बारूद की महक भी घुली हुई है... सत्ता की बारूद। हर पोस्टर, हर रोड शो, हर रैली में एक सवाल गूंज रहा है। क्या बिहार बिना बाहुबल के चुनाव जीत सकता है? यह सवाल नया नहीं, लेकिन इसका जवाब हर बार पहले जैसा ही होता है- मुश्किल है।

सत्ता का रास्ता बंदूक से होकर गुजरता

बिहार की राजनीति का इतिहास ऐसा है, जहां बंदूक की नली से सिर्फ गोली नहीं, वोट भी निकले हैं। यहां धनबल और बाहुबल का ऐसा गठजोड़ है जो दशकों से पार्टियों की रणनीति का हिस्सा बन चुका है। हर चुनाव में पार्टियां जानती हैं कि मैदान में जीत सिर्फ भाषणों या वादों से नहीं, बल्कि ‘इलाके की पकड़’ से तय होती है और यही पकड़ बाहुबली नेताओं के पास होती है।

राजनीतिक समीकरण इस हद तक बदल चुके हैं कि अगर किसी बाहुबली को टिकट नहीं मिलता, तो वही सीट उसके परिवार के किसी सदस्य को मिल जाती है। कभी ये पति-पत्नी का खेल होता है, कभी पिता-पुत्र का। नतीजा वही वोट भी उन्हीं का, ताकत भी उन्हीं की।

बाहुबलियों की फौज फिर मैदान में

इस बार के चुनाव में भी वही पुरानी पटकथा दोहराई जा रही है, बस किरदार कुछ नए हैं। राजद (RJD) ने रीतलाल यादव को दानापुर से, ओसामा शहाब को रघुनाथपुर से, और वीणा देवी को मोकामा से टिकट दिया है। जेडीयू (JDU) भी पीछे नहीं है अनंत सिंह, चेतन आनंद, विभा देवी जैसे नाम मैदान में हैं। भाजपा (BJP) ने भी कई चेहरों को चुना है जिनकी ‘लोकप्रियता’ अदालतों से ज्यादा जेलों में गूंज चुकी है। यह सिलसिला यहीं नहीं रुकता लोजपा (LJP) से लेकर छोटे दलों तक, सबने बाहुबल को टिकट की गारंटी मान लिया है।

राजनीति, जाति और अपराध का तिकोन

बिहार की राजनीति सिर्फ बाहुबल की कहानी नहीं है, यह जातीय समीकरणों की जंग भी है। हर पार्टी जानती है कि किसी जाति विशेष का ‘चेहरा’ जिताऊ साबित हो सकता है फिर चाहे उसका बैकग्राउंड कैसा भी हो। बाहुबली इस समीकरण को बखूबी समझते हैं। वे अपने समाज की ताकत और डर, दोनों का इस्तेमाल वोट में तब्दील कर लेते हैं।

कई बार जनता भी आंख मूंदकर अपने ‘समाज के नेता’ को समर्थन दे देती है, चाहे उसका रिकॉर्ड कितना ही दागदार क्यों न हो। यही वजह है कि राजनीति में अपराधियों का रास्ता और चौड़ा होता जा रहा है।

क्या बदल पाएगा बिहार?

बिहार की राजनीति में बाहुबली नेताओं की मौजूदगी कोई अपवाद नहीं, बल्कि परंपरा बन चुकी है। एक दौर था जब ये लोग नेताओं के लिए काम करते थे, आज नेता इनके लिए काम करते हैं। लेकिन अब सवाल यही है कि क्या बिहार कभी इस परंपरा से मुक्त हो पाएगा? क्या कोई ऐसा दौर आएगा जब टिकट योग्यता से मिलेगा, ताकत से नहीं?

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Gausiya Bano

Gausiya Bano is a Multimedia Journalist based in Lucknow, the capital city of Uttar Pradesh, currently serving as Desk In-Charge at Newstrack. She holds a postgraduate degree in Journalism from Makhanlal Chaturvedi National University, Bhopal, Madhya Pradesh. With over 2.5 years of experience, she has worked with leading organizations including Rajasthan Patrika and NewsBytes. She has expertise in news desk operations, reporting and digital journalism. At Newstrack She oversees content management, ensures editorial accuracy and coordinates with reporters to maintain high newsroom standards. Passionate about ethical reporting and adapting to the evolving media landscape, Gausiya Bano continues to grow as a dedicated and responsible journalist.

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