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Congress का 'साइलेंट रिवाइवल', हार के बावजूद वोट बैंक अटूट, Rahul Gandhi सबसे बड़े नेता
Rahul Gandhi Popularity: कांग्रेस की वापसी शुरू? हार के बावजूद वोट शेयर बरकरार, Rahul Gandhi का नया राजनीतिक कद
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Rahul Gandhi Popularity: पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार जाने और भाजपा की सरकार के बन जाने का जो उत्साह भाजपाईयों में देखा जा रहा है वह एक बड़ी सच्चाई से टकराकर ठंडा पड़ सकता है। सच्चाई ये कि जैसे-जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों के किले ज़मींदोज़ हो रहे हैं, वैसे-वैसे आमने-सामने की लड़ाई के नए मोर्चे खुलते जा रहे हैं। इंडिया गठबंधन के जो नेता ‘मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना’ की चाल चल रहे थे, उनके सामने राहुल गांधी को नेता और काँग्रेस को 'बिग ब्रदर' मानने की मजबूरी बढ़ती जा रही है। यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि क्षेत्रीय दल जिन्हें भाजपाई अश्वमेध का घोड़ा विजय करता जा रहा है, वे कांग्रेसी वोट से ही पले बढ़े हैं। उन्होंने अपनी विकास यात्रा में काँग्रेस के हिस्से को ही अपने पाले में किया है। जब ये दल कमज़ोर होंगे तो वे वोट घर वापसी करेंगे। भाजपा की ओर रुख़ करने वालो की संख्या बेहद कम होगी।
बारह साल में इक्कीस राज्य, फिर भी जादू अधूरा
2014 में नरेंद्र मोदी के आगमन के बाद से भाजपा ने बारह साल की अपनी राजनीतिक यात्रा में 21 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में सरकारें बनाईं। देश की 72 फीसदी आबादी भाजपा शासित राज्यों में रहती है। लेकिन इस 'मेटेलिक राइज़' की कहानी को पलटकर देखें तो साफ होता है कि 2014 का करिश्माई जनादेश आगे उसी तेवर से जारी नहीं रह सका।
2014 में भाजपा ने सौ साल पुरानी काँग्रेस को सबसे निचले पायदान पर ला पटका और पहली बार गैर-काँग्रेसी पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई, वह भी अल्पसंख्यक मतों के बिना। भाजपा ने यह भी साबित कर दिखाया कि अकेले बहुसंख्यक लोग बहुमत की सरकार बना सकते हैं। सरकार बनाने के लिए अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की जरूरत नहीं है।
कछुए की चाल से चले राहुल, पर पहुँचे मंज़िल तक
2014 में मुँह के बल गिरी काँग्रेस ने उसके बाद से ही धीरे धीरे उठना शुरू कर दिया। जिस राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर सवाल उठाये जा रहे थे, वह राहुल गांधी कछुए के मानिंद अपनी यात्रा जारी रखे रहे। जिस पार्टी के भविष्य पर सवाल उठ रहे थे, वही पार्टी अब भाजपा से मुक़ाबिल नज़र आने लगी है। 2019 में राहुल गांधी के अध्यक्ष रहते हुए पार्टी में मामूली सुधार हुआ और वह 52 सांसदों तक जा पहुंची।
2024 के चुनाव में राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने एक बड़ी छलांग लगाई और 99 सीटें, गठबंधन सहयोगियों को मिलाकर 'इंडिया' ब्लॉक ने 230 सीटें, हासिल कीं। यह 2014 के मुकाबले सीटों में 125 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी है। वोट शेयर के लिहाज़ से देखा जाये तो 2014 में काँग्रेस को देशभर में 19.3 फीसदी वोट मिले थे जबकि 2019 में मोदी लहर के बावजूद कांग्रेस ने अपना वोट शेयर 19.5 बनाये रखा। 2024 के चुनाव में कांग्रेस का व्यक्तिगत वोट शेयर बढ़कर लगभग 21.2 फीसदी हो गया। राष्ट्रीय स्तर पर वोट प्रतिशत में यह बढ़ोतरी दिखाती है कि राहुल गांधी की स्वीकार्यता देशव्यापी स्तर पर बढ़ी है।
राहुल गांधी की अपनी सीटों पर जीत का अंतर दिखाता है कि जमीन पर उनके प्रति जनता का भरोसा मजबूत हुआ है। राहुल गांधी ने 2019 में केरल की वायनाड सीट से 4,31,770 वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की थी।2024 में जब उन्होंने गांधी परिवार के पारंपरिक गढ़ रायबरेली से चुनाव लड़ा, तो उन्होंने अपनी मां सोनिया गांधी के 2019 के जीत के मार्जिन 1.67 लाख को पीछे छोड़ते हुए 3,90,030 वोटों के अंतर से जीत हासिल की। इसी चुनाव में वायनाड से भी उन्होंने दोबारा 3,64,422 वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की।
भारत जोड़ो यात्रा: पदयात्रा बनी 'गेम चेंजर'
2022-2023 में कन्याकुमारी से कश्मीर तक की 4,000 किलोमीटर से अधिक की भारत जोड़ो पैदल यात्रा ने राहुल गांधी की छवि को पूरी तरह बदल दिया। आंकड़ों में देखें तो इस यात्रा ने कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों में कांग्रेस की सत्ता में वापसी की जमीन तैयार की। 2024 की 'भारत जोड़ो न्याय यात्रा' ने हिंदी बेल्ट विशेषकर उत्तर प्रदेश में सपा-कांग्रेस गठबंधन को मजबूत किया, जहां बीजेपी को सबसे बड़ा नुकसान हुआ।
2014 और 2019 में कांग्रेस के पास लोकसभा में कुल सीटों का 10 फीसदी यानी 54 सीटें भी नहीं थीं। जिसके कारण आधिकारिक रूप से 'विपक्ष के नेता' का पद नहीं मिल सका था। 2024 में 99 सीटें जीतने के बाद, राहुल गांधी खुद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बन बैठे। यह उनके राजनीतिक कद में आई सबसे बड़ी संवैधानिक और रणनीतिक बढ़त है।


