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Congress का 'साइलेंट रिवाइवल', हार के बावजूद वोट बैंक अटूट, Rahul Gandhi सबसे बड़े नेता
Rahul Gandhi Popularity: कांग्रेस की वापसी शुरू? हार के बावजूद वोट शेयर बरकरार, Rahul Gandhi का नया राजनीतिक कद
हार के बाद भी वोट बैंक अडिग
2014 के बाद से राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष रहने या उनके मुख्य चेहरा होने के दौरान कांग्रेस ने कई प्रमुख राज्यों में चुनाव जीतकर सरकारें बनाईं। कांग्रेस सरकारें गंवाती जरूर है। लेकिन उसका कोर वोट शेयर लगभग 40 प्रतिशत आसानी से नहीं घटता।राजस्थान और छत्तीसगढ़ इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। जहां हारने के बाद भी कांग्रेस का वोट शेयर लगभग जस का तस रहा। बस बीजेपी अपने वोट प्रतिशत को बढ़ाने में कामयाब रही। पंजाब एकमात्र ऐसा राज्य था जहाँ क्षेत्रीय दल के सामने आते ही काँग्रेस का वोट शेयर बुरी तरह गिरा।
2022 में हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस ने बीजेपी को सत्ता से बाहर कर पूर्ण बहुमत पाया। 'भारत जोड़ो यात्रा' के बाद 2023 में कर्नाटक में भारी बहुमत के साथ सरकार बनाई।इसी साल राज्य गठन के बाद पहली बार केसीआर की बीआरएस को हराकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की।
राजस्थान: हार हुई, वोट नहीं गए
राजस्थान में हर 5 साल में सरकार बदलने का रिवाज रहा है। 2018 में जब कांग्रेस जीती थी और उसको 99 सीटें तथा 39.30 फीसदी वोट मिले थे। कुल वोटों के लिहाज़ से देखें तो यह आँकड़ा 1.26 करोड़ बैठता है। भाजपा को 73 सीटें मिली थीं। 38.08 फीसदी वोट शेयर तथा कुल 1.22 करोड़ वोट हाथ लगे थे। लेकिन 2023 में भाजपा जीती और उसे 115 सीटें मिलीं।
41.69 फीसदी वोट शेयर रहा तथा कुल 1,65,24,787 वोट मिले। काँग्रेस हार गई तो उसे 70 सीटें हाथ लगीं। उसे 39.55 फीसदी वोट शेयर तथा कुल 1,58,80,001 वोट मिले। साफ है कि काँग्रेस हारी ज़रूर लेकिन उसका वोट शेयर 2018 में 39.30 फीसदी के मुकाबले थोड़ा बढ़कर 39.55 फीसदी रहा।
छत्तीसगढ़: बीजेपी ने छोटे दलों के वोट खींचे, काँग्रेस का कोर बचा रहा
अब छत्तीसगढ़ पर आते हैं। 2018 में कांग्रेस ने यहाँ एकतरफा लैंडस्लाइड जीत दर्ज की थी। लेकिन 2023 में बीजेपी ने अप्रत्याशित रूप से बड़ी बढ़त बनाकर सत्ता छीन ली। लेकिन 2018 में जब कांग्रेस जीती तब उसे 68 सीटें व 43.0 फीसदी वोट मिले। कुल वोट के लिहाज़ से यह संख्या 61,36,429 बैठती हैं। भाजपा को केवल 15 सीटें तथा 33.0 फीसदी वोट हाथ लगे। कुल वोटों के लिहाज़ से यह आँकड़ा 47,01,530 ही बैठता है।
जब 2023 में काँग्रेस की सरकार गई और भाजपा आई तब काँग्रेस को 35 सीटें मिलीं और 42.8 फीसदी वोट।जबकि भाजपा को 54 सीटें और 46.9% वोट हाथ लगे। निःसंकोच भाजपा के वोट शेयर में भारी उछाल रहा। लेकिन यहाँ भी कांग्रेस का मुख्य वोट बैंक तकरीबन 42.8 फीसदी लगभग सुरक्षित रहा। लेकिन बीजेपी ने अन्य छोटी पार्टियों और निर्दलीयों के वोट अपनी तरफ खींचकर 46.9 फीसदी का बड़ा आँकड़ा खड़ा कर लिया।
मध्य प्रदेश: दलबदल ने सरकार गिराई, जनादेश नहीं
2018 में मध्य प्रदेश में काँग्रेस व भाजपा में कांटे की टक्कर थी। कांग्रेस ने सरकार बनाई। लेकिन 2020 में दलबदल से सरकार गिर गई। बीजेपी के शिवराज सिंह चौहान फिर सीएम बने। 2023 के चुनाव में बीजेपी को बंपर बहुमत तथा 163 सीटें मिलीं।
वोट शेयर रहा 48.62 फीसदी। कुल 2,06,58,587 वोट हाथ लगे।काँग्रेस हारी और उसे 66 सीटें मिलीं। लेकिन वोट शेयर 40.45 फीसदी रहा और कुल 1,71,88,236 वोट मिले। 2018 में जब कांग्रेस जीती तब उसे 114 सीटें मिलीं थीं। 41.05 फीसदी वोट शेयर रहा और कुल 1,55,95,696 वोट हाथ लगे। बीजेपी को इस चुनाव में 109 सीटें मिलीं। 41.06 फीसदी वोट शेयर तथा कुल 1,56,43,623 वोट हाथ लगे थे। बीजेपी का वोट प्रतिशत थोड़ा अधिक रहा लेकिन सीटें कांग्रेस की ज्यादा थीं।
पंजाब: एकमात्र अपवाद, जहाँ आप ने काँग्रेस को रौंदा
पंजाब का मामला अलग है। यहाँ कांग्रेस अपनी आपसी कलह - कैप्टन अमरिंदर सिंह बनाम नवजोत सिंह सिद्धू बनाम चरणजीत सिंह चन्नी के कारण हारी। यहाँ फायदा बीजेपी को नहीं बल्कि आम आदमी पार्टी को मिला।2017 में जब कांग्रेस जीती तब उसे 77 सीटें तथा 38.5 फीसदी वोट मिले।
इस चुनाव में भाजपा को केवल 3 सीट तथा 5.4 फीसदी वोट मिले। यहां भाजपा अकाली दल के साथ गठबंधन में थी। 2022 में काँग्रेस की सरकार गयी तो आम आदमी पार्टी ने 92 सीटें तथा 42.01% वोट हासिल किये। कांग्रेस को केवल 18 सीटें तथा 22.98 फीसदी यानी कुल 35,76,684 वोट हाथ लगे। यहां यह देखना दिलचस्प है कि जहां काँग्रेस को क्षेत्रीय क्षत्रप के सामने करारी शिकस्त झेलनी पड़ी पर उसके वोट शेयर में कहीं उल्लेखनीय गिरावट दर्ज नहीं हुई।
उत्तर प्रदेश: गठबंधन की ताकत या काँग्रेस की अपनी उड़ान?
अब राम बात करते हैं उत्तर प्रदेश की। उत्तर प्रदेश के 2022 के विधानसभा चुनाव में काँग्रेस को 2.33 फीसदी यानी 21,51,234 वोट ही मिले। केवल दो विधायक जीत पाये। जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में काँग्रेस पार्टी को इस राज्य में मिले वोटों की संख्या बढ़कर 9.46 फीसदी यानी 83,16,1446 हो गई। बहुत दिनों बाद इसके सांसदों की संख्या बढ़कर छह हो गयी।
भाजपा को 2022 के विधानसभा चुनाव में 3,80,51,721 यानी 41.29 फीसदी वोट मिले। जबकि 255 विधायक जीत कर आये। जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को कुल 3,62,67,072 वोट मिले। जो तक़रीबन 41.37 फीसदी बैठता है। भाजपा के तैंतीस सांसद ही जीतने में कामयाब रहे।
इन आँकड़ों के बाद आसानी से यह कहा जा सकता है कि काँग्रेस पार्टी के दो करोड़ इकसठ लाख वोट बढ़े और इसकी वजह सपा के साथ गठबंधन रहा। यह बात आंशिक रुप से ही सही कही जा सकती है। इसकी परख के लिए हमें समाजवादी पार्टी के इन दोनों चुनावों के नतीजों पर नजर डालना ज़रूरी हो जाता है। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा को 2,95,43,934 यानी 32.06 फीसदी वोट मिले। केवल 111 विधायक जीतने में कामयाब रहे। जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में 2,94,29,761 वोट, जो तक़रीब 33.59 फीसदी बैठता है, मिला। उसके 37 प्रत्याशी जीतने में कामयाब हुए। ये आँकड़े बताते हैं कि लोकसभा में जब सपा के केवल तक़रीबन एक लाख वोट कम हुए।
2022 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मिलने वाले वोटों की संख्या में करीब 18 लाख वोटों की कमी आई। जबकि कांग्रेस के वोटों की संख्या में लगभग 4 गुना करीब 61 लाख वोट की बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई।
बिहार, असम, बंगाल: हाशिए पर भी काँग्रेस बढ़ रही है
हाल के असम और पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों पर नज़र दौड़ाई जाये तो इन दोनों राज्यों में काँग्रेस किसी प्रभावशाली स्थिति में नहीं दिखती। फिर भी, ममता व भाजपा की लड़ाई में काँग्रेस ने अपने वोटों में बढ़ोतरी ही की है। 2026 के चुनाव में काँग्रेस को यहां 18,90,858 वोट मिले। जबकि 2021 के चुनाव में यह आँकड़ा 17,57,131 का रहा था। रही बात असम की तो 2021 के चुनाव में काँग्रेस को 57,03,341 वोट मिले जबकि 2026 में उसके हिस्से 60,46,680 वोट आये जो तकरीबन तीन लाख ज्यादा हैं। 2020 के बिहार विधानसभा में काँग्रेस को 39,95,003 यानी तकरीबन करीब 40 लाख वोट मिले। जबकि 2025 के चुनाव में 42,88,800 वोट हासिल हुए।
गुजरात: इकलौती जगह जहाँ काँग्रेस का आधार सचमुच टूटा
गुजरात इकलौता ऐसा राज्य है जहां 2017 से 2022 के बीच केवल 5 वर्षों में कांग्रेस ने राज्य में अपने करीब 37.5 लाख वोट और 14.16 फीसदी वोट शेयर खो दिए।लेकिन दिलचस्प यह है कि ये वोट भाजपा के पास नहीं गये। इसे क्षेत्रीय क्षत्रप आम आदमी पार्टी ने हड़प लिया। क्योंकि उसे इस चुनाव में तकरीबन तेरह फीसदी वोट हाथ लग गये।
असली मुकाबला: मोदी बनाम राहुल, और आँकड़े क्या कहते हैं
अब आते हैं 2014 से 2026 के बीच पड़े तीन लोकसभा चुनाव पर। 2014 के चुनाव में भाजपा को 17.16 करोड़ वोट मिले। जो तकरीबन 31.3 फीसदी बैठता है। जबकि 2019 के चुनाव में यह आँकड़ा बढ़कर 22.90 करोड़ यानी 37.7 फीसदी हो गया।
2024 में भाजपा को 23.6 करोड़ यानी 36.6 फीसदी वोट मिले। जबकि काँग्रेस पार्टी को 2014 में 10.69 करोड़ यानी 19.3 फीसदी ही वोट मिल पाये।
2019 में कांग्रेस को 11.92 करोड़ वोट यानी 19.5 फीसदी मिले। ये पिछले लोकसभा चुनाव से तकरीबन एक करोड़ अधिक थे। 2024 में काँग्रेस के वोट बढ़कर 14.4 करोड़ यानी 21.2 फ़ीसद तक जा पहुँचे। साफ है कि नरेंद्र मोदी के आभा मंडल के सामने राहुल गांधी ने अपनी पार्टी के वोटों में तकरीबन चार करोड़ का इज़ाफ़ा किया। यह बात दीगर है कि भाजपा ने भी इसी कालखंड में छह करोड़ नये वोट अपने खाते में जोड़े। लेकिन उसकी वृद्धि दर अब धीमी पड़ रही है, जबकि काँग्रेस की रफ्तार तेज़ हो रही है।
वोटों की 'घर वापसी' बाकी है
काँग्रेस सरकारें गंवाती ज़रूर है, लेकिन उसका कोर वोट शेयर लगभग 40% के आसपास अडिग रहता है। राजस्थान और छत्तीसगढ़ इसके सबसे बड़े प्रमाण हैं। क्षेत्रीय दल जिन काँग्रेसी वोटों के दम पर पले-बढ़े हैं, वे जब-जब कमज़ोर पड़ेंगे, तब-तब वे वोट काँग्रेस के खाते में लौटेंगे।
भाजपा का असली इम्तिहान तब होगा जब वह काँग्रेस से सीधे टकराएगी, बिना किसी क्षेत्रीय 'बफर' के। और उस टकराव के लिए काँग्रेस अब पहले से कहीं ज़्यादा तैयार दिखती है।

