सोशल मीडिया के दौर में हर तरह के परिवारवाद पर ख़तरा है

Nepotism in India: हर क्षेत्र में नेपोटिज्म के खिलाफ हैं युवा

Raj Kumar Singh
Published on: 15 Sept 2025 1:12 PM IST (Updated on: 17 Sept 2025 4:39 PM IST)
सोशल मीडिया के दौर में हर तरह के परिवारवाद पर ख़तरा है
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Nepotism: हाल ही में दुनिया के कई देशों में युवा सड़कों पर उतरे हैं। कई देशों में युवाओं ने सत्ता भी पलट दी है। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल इसके ताजा उदाहरण हैं। अन्य मुद्दों के अलावा एक और नई बात जो देखने को मिल रही है वह है शक्तिशाली लोगों द्वारा किए जा रहे परिवारवाद का आमजन द्वारा विरोध। दरअसल युवाओं को सबसे अधिक इसी बात पर आक्रोश हो रहा है कि उनका हक किसी अन्य युवा को सिर्फ इसलिए मिल रहा है कि वह किसी शक्तिशाली व्यक्ति की संतान है या रिश्तेदार है। दरअसल इंटरनेट क्रांति के इस दौर में कुछ भी छिपाना असंभव है।

दुनियाभर में और हर क्षेत्र में है नेपोटिज्म

परिवारवाद या भाई-भतीजावाद को पूरी दुनिया में नेपोटिज्म के नाम से जाना जाता है। और यह नेपोटिज्म दुनिया के हर देश में पाया जाता है, कुछ अधिक या कम मात्रा में। नेपोटिज्म हर क्षेत्र में होता है। खासतौर से ऐसे क्षेत्रों में यह अधिक देखने को मिलता है जहां कोई तकनीकि या विशेषज्ञ डिग्री की जरूरत ना हो। जैसे कि राजनीति, कला, अभिनय, खेल, मीडिया, मनोरंजन आदि में। यह सबसे अधिक दृश्यमान राजनीति और फिल्म में होता है। यही कारण है कि युवाओं में सर्वाधिक आक्रोश भी इन्हीं क्षेत्रों में नेपोटिज्म को लेकर रहता है।

राजनीति में खुलेआम है परिवारवाद

भारत में राजनीति में भाई-भतीजावाद खुलेआम है। और यह अब तक स्वीकार्य भी रहा है। स्वतंत्रता के बाद से लेकर अब तक सभी दलों में और अधिकतर बड़े नेताओं में नेपोटिज्म चलता रहा है। कांग्रेस पर तो परिवारवाद के सबसे अधिक आरोप हैं। चूंकि इस पार्टी ने सबसे अधिक समय तक देश की सत्ता संभाली है, इसलिए स्वाभाविक रूप से यह संभव भी है।

कांग्रेस के परिवारवाद का विरोध करने वाले सभी दलों ने भी आखिरकार परिवारवाद का रास्ता चुना ही। देश के करीब करीब सभी क्षेत्रीय दलों में परिवारवाद हावी रहा है। इन दलों के प्रमुख की कमान हमेशा एक ही परिवार के हाथ में रहती है। सरकार बनने पर मुखिया भी इसी परिवार से बनता है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि यदि कोई सामान्य व्यक्ति भी एक बार किसी सीट से सांसद या विधायक बन जाता है तो उस सीट से अगला उम्मीदवार भी उसी के पुत्र-पुत्री या रिश्तेदार होते हैं। और यह चलन स्वीकार्य भी है।

कई नेता परिवारवाद से दूर- पीएम मोदी, डॉ मनमोहन सिंह, वीपी सिंह, योगी और नीतीश शामिल

साल 2014 से देश की सत्ता संभाले बीजेपी में भी परिवारवाद के कई उदाहरण हैं। हालांकि यह भी एक खास बात है कि बीजेपी के शीर्ष नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मोह से पूरी तरह मुक्त हैं। मोदी के अलावा बीजेपी नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ मुरली मनोहर जोशी भी नेपोटिज्म से बचे रहे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी परिवारवाद से दूर हैं। नेपोटिज्म से दूर रहने वालों में पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह और डॉ मनमोहन सिंह और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम भी प्रमुखता से लिया जा सकता है।

मनोरंजन में हिट है लेकिन खेल में फ्लाप

यदि हम मनोरंजन के क्षेत्र की बात करें तो यहां भी बड़े पैमाने पर परिवारवाद रहा है। राजकपूर से लेकर अब अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान तक यह बदस्तूर जारी है। फिल्म उद्योग में नेपोटिज्म की एक लंबी सूची है। खेलों में भी भाई-भतीजावाद देखने को मिलता रहा है लेकिन यहां अत्यधिक उच्च स्तर की स्पर्धा के कारण यह सफल नहीं रहा है।

राजनीति में परिवारवाद का प्रतिकूल असर

राजनीति का नेपोटिज्म अन्य क्षेत्रों से इसलिए अलग है कि यहां होने वाले भाई-भतीजावाद का असर पूरे देश पर देखने को मिलता है। सांसद-विधायक से लेकर प्रधान तक के दरवाजे कई बार सामान्य कार्यकर्ताओं के लिए वर्षों तक बंद हो जाते हैं। कई योग्य नेताओं को जीवनभर विधानसभा और संसद का मुंह देखने का मौका नहीं मिलता है। यही वजह है कि युवाओं का गुस्सा राजनीति में परिवारवाद पर अधिक रहता है। यहां एक बात स्पष्ट है कि जैसे जैसे लोगों में जागरूकता बढ़ेगी और इंटरनेट का प्रसार बढ़ेगा अब शक्तिशाली लोगों के लिए नेपोटिज्म का सहारा लेना आसान नहीं रहेगा।

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Raj Kumar Singh
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Raj Kumar Singh

राज कुमार सिंह जन्म: 1 जनवरी 1971, तत्कालीन इटावा, (अब औरैया) जिले की बिधूना तहसील में। शिक्षा: मध्य एवं आधुनिक भारतीय इतिहास से एम.ए. (लखनऊ विश्वविद्यालय), एम.ए., पत्रकारिता (लखनऊ विश्वविद्यालय)। कार्य: 1994 से पत्रकारिता। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में कई संस्थानों में कार्य किया। प्रिंट में नवभारत टाइम्स, लखनऊ में बतौर राजनीतिक संपादक कार्य किया। इसके अलावा हिंदुस्तान अखबार के प्रयागराज संस्करण में स्थानीय संपादक, वाराणसी संस्करण में स्थानीय संपादक और लखनऊ संस्करण में उप संपादक के तौर पर काम किया। इलेक्ट्रानिक मीडिया में सहारा समय उत्तर प्रदेश और न्यूज-24 चैनल में लखनऊ में ब्यूरो चीफ रहे। वायस ऑफ इंडिया न्यूज चैनल में लखनऊ में ब्यूरो चीफ और फिर स्थानीय संपादक के तौर पर काम किया। न्यूज एक्सप्रेस चैनल में लखनऊ में पहले स्टेट हेड फिर कोआर्डिनेटिंग एडिटर के तौर पर काम किया।

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