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Dalai Lama Intresting Facts: आखिर कितना जीने की चाहत रखें !
Dalai Lama Intresting Facts: तिब्बत के आध्यात्मिक नेता और बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा ने अपने जीवन के 90 साल पूरे होने पर एक ऐसी बात कही जो एक नया नज़रिया पेश करती है।
Dalai Lama Intresting Facts
Dalai Lama Intresting Facts: उम्र की कोई सीमा नहीं। न न्यूनतम, न अधिकतम। जो कुछ है वो सब इत्तेफाक है। सब जानते हुए भी आखिर कौन कितना जीना चाहता है? इसकी भी कोई सीमा नहीं। सोचते तो सभी हैं कि या तो अमर रहेंगे या सैकड़ों साल जीते रहेंगे या वो दिन कभी आयेगा ही नहीं। ये भी एक हैरान करने वाली बात है कि बहुत लंबा जीना चाहते तो हैं हम । लेकिन दिल की बात जुबां पर कभी आती नहीं। कोई कहता सुना नहीं गया कि वो इतने साल जीना चाहता है। हाँ, मरने की आकांक्षा जाहिर करने के क्षण बहुतों के जीवन में कई बार आते जरूर हैं।
खैर, कोई कितना जीना चाहता है, इस बारे में तिब्बत के आध्यात्मिक नेता और बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा ने अपने जीवन के 90 साल पूरे होने पर एक ऐसी बात कही जो एक नया नज़रिया पेश करती है और बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती है। दलाई लामा ने अपनी 90 वीं वर्षगांठ के अवसर पर बेलाग कहा कि वे और 30-40 साल लोगों की सेवा करना चाहते हैं। यहां इस बात का ज़िक्र ज़रूरी हो जाता है कि दुनिया में सबसे लंबी उम्र वाले इंसान का नाम जीन कैलमेन्ट था। वह 122 वर्ष और 164 दिन जिये।
90 और 40 यानी 130 साल! 90 वर्ष की उम्र ही अपने आप में एक विशिष्ट माइलस्टोन है, ऐसे में 130 वर्ष का लक्ष्य और इसकी कामना एक बड़ी बात है। ये कोई घमंड नहीं, कोई शेखी नहीं, कोई आत्म प्रवंचना नहीं, कोई लालच नहीं, कोई मृत्यु भी नहीं। ये सिर्फ एक अद्भुत विश्वास और आत्मविश्वास का परिचायक है। दुनिया में और भी आध्यात्मिक नेता - धर्मगुरु हुए हैं लेकिन क्या कभी ने ऐसा विश्वास व्यक्त किया?
कतई नहीं।
क्या ऐसी चाहत किसी और ने कभी ज़ाहिर की? ढेरों बाबा, प्रवचक, धर्म नेता वगैरह की ऐसी कामना सुनने में नहीं आई। उनको छोड़िए, हमारे आपके परिवार-समाज में किसी के मुंह से इतनी लम्बी उम्र, और उस उम्र के उद्देश्य के बारे में सुना? शायद नहीं। सुना होगा तो बस इतना कि – भगवान इतनी उम्र दो कि सब जिम्मेदारियां यानी बेटी की शादी, बेटे का सेटलमेंट कर लें। बस। इसके आगे कुछ नहीं। 70 के बाद तो उलटी गिनती ही शुरू हो जाती है, अगले 30-40 साल की बात तो छोड़ ही दीजिये। ऐसे में दलाई लामा जैसा विश्वास बहुतों के मन में एक सवाल जरूर जगाता है कि आखिर हम ऐसा क्यों नहीं सोचते?
लेकिन ऐसा है क्यों? वो कौन सी बाधाएं हैं जो हमें दलाई लामा जैसा विश्वास व्यक्त करने से रोकती हैं? इसके जवाब में सबके अपने अपने तर्क हो सकते हैं। लेकिन कुछ बातें अवश्य ही एक सार्वभौमिक दृष्टिकोण पेश करती हैं।
एक बात कही जा सकती है सामाजिक-सांस्कृतिक-धार्मिक नजरिये की। अपनी उम्र, मौत – इनके बारे में हम बातें करने से कतराते हैं। एक भय रहता है। भय नजर लग जाने का। भय अपनी ही कही बात से ही कुछ अनिष्ट हो जाने का। हम सवा सौ साल जीने की बात करने लगे तो लोग क्या कहेंगे? नजर लगा देंगे। तरह तरह की आशंकाएं।गांधी ने खुद के एक सौ बीस साल जीने की इच्छा जताई थी। महात्मा गांधी ने स्वयं कई बार यह कहा था, “मैं 120 वर्ष तक जीना चाहता हूँ, और उसके लिए योग, उपवास, संयमित आहार और सत्य का पालन करूंगा।” इसके लिए उन्होंने मानसिक व आध्यात्मिक तैयारी भी की थी।
एक बात जो सबसे बड़ी है वो है कि आखिर कितने ही लोग सौ-सवा सौ साल तो क्या, 90 पार भी जीना चाहते हैं? आम लोग ऐसे ही पीड़ित और पिटे हुए हैं, जैसे तैसे जिन्दगी खींच रहे हैं, ऐसे में कौन लम्बी दौड़ में घिसटना चाहेगा? खुशगवार, संतुष्ट, किसी काम का जीवन हो तो भला कोई सोचे भी 100 साल की। यही नहीं, परिवार, रिश्तों, मोहल्ले, समाज, में बूढ़ों - बुजुर्गों की हालत देख कर भला कौन उस स्थिति तक पहुंचना चाहेगा? अपनों में ही उपेक्षित, दुत्कारे और अकेले पड़े जी रहे लोगों को देख कर भला किसमें लम्बी उम्र की चाहत पैदा होगी?
हममें हौसला बने भी तो कैसे? एक एक दिन जब संघर्ष में बीते, हर दिन एक नई आशंका ले कर आये, भविष्य की सोच कर अवसाद और घबराहट पैदा हो जाए तो फिर कोई लक्ष्य बनायें भी तो कैसे? ज़रा अस्पताल जा कर बीमारों और बीमारियों की हालत देखिये। डर कर भाग आएंगे या वैराग्य हो जाएगा। जीवन के प्रति उत्साह जग ही नहीं पाता।
दलाई लामा अलग हैं। बचपन में ही घर-देश छोड़ कर भागना पड़ा। तभी से निर्वासित जीवन जी रहे हैं। लेकिन कभी कोई नेगेटिव बात, किसी तरह के प्रतिशोध की बात, किसी हिंसा की बात सुनी उनसे? नहीं। सिर्फ शांति और सेवा की बात। क्या उनको दुःख नहीं होंगे? चिंताएं नहीं होंगी? आखिर वे भी एक इंसान हैं, हमारे-आप जैसे। लेकिन उन्होंने एक शक्ति हासिल की है। वो सादगी से भरा प्राचीन पारंपरिक तिब्बती जीवन जीते आये हैं आज तक। पहाड़ों पर एक सुरम्य और शांत माहौल में रहते हैं। अपने ईश पर अटूट विश्वास है, एक आध्यात्मिक शक्ति हैं।यही सब मिल जुल कर उन्हें एक विश्वास देता है, एक उद्देश्य और लक्ष्य देता है। वो प्रवचन नहीं देते। बनावटी, खोखली बातें नहीं करते। धार्मिक आडंबर की बात नहीं करते। वो बस एक आध्यात्मिक पुंज हैं।
तर्क दे सकते हैं कि उन्हें ढेरों सुख सुविधाएँ उपलब्ध हैं। लेकिन सुख सुविधाएँ बहुतों को उपलब्ध हैं, उनसे कई गुना ज्यादा ही उपलब्ध होंगी । लेकिन फिर भी क्या किसी से वो बात सुनी जो दलाई लामा ने कही है? हम दलाई लामा का लेश मात्र भी नहीं हैं। लेकिन उन्होंने जो कहा, जैसा वो जीते हैं, वह हमारे लिए बहुत कुछ सीखने की बात है, प्रेरणा है, आत्म अन्वेषण की बात है। ये किसी धर्म की बात कतई नहीं है। दलाई लामा का कहा गया मात्र एक वाक्य सोचने के तमाम दरवाजे खोलता है। यही इसका एकमात्र बिंदु है। ये सिर्फ मंथन करने की बात है। हम आप भी भी उन दरवाजों में झांक कर देख तो लें, शायद जिन्दगी के प्रति एक नया नजरिया वहां मिल जाए। यही नज़रिया जीने की चाहत देता है। हर पल जीने की उमंग देता है। ज़िंदगी को लंबी और बड़ी दोनों बनाने की प्रेरणा देता है। यही जीवन जीने का मकसद देता है। यही मकसद ज़िंदगी को अर्थपूर्ण भी बनाता है।
( लेखक पत्रकार हैं।)


