Sujni embroidery of Bihar: पुराने कपड़ों से जन्मी कला, जिसने बनाया बिहार को मशहूर

Sujni embroidery of Bihar which has made Bihar famous all over the world: बिहार की सुजनी कढ़ाई महिलाओं की भावनाओं और सशक्तिकरण की प्रतीक है, जिसने पारंपरिक रजाइयों से निकलकर विश्व मंच पर अपनी पहचान बनाई है।

Jyotsana Singh
Published on: 11 Nov 2025 3:58 PM IST
Sujni embroidery of Bihar: पुराने कपड़ों से जन्मी कला, जिसने बनाया बिहार को मशहूर
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Sujni embroidery of Bihar

बिहार: भारत की लोककलाओं में कुछ परंपराएं ऐसी हैं जो हाथों के हुनर के साथ ही दिल से भी जुड़ाव रखती हैं। बिहार की सुजनी कढ़ाई ऐसी ही एक अद्भुत विरासत है। जिसका हर टांका कोमल भावनाओं से जुड़ाव रखता है। जिसकी हर कलाकारी में मातृत्व, आस्था और परंपरा की झलक मिलती है।

वात्सल्य और ममता में डूबी यह कढ़ाई कभी माताओं द्वारा अपने नवजात बच्चों के लिए बनाई गई रजाइयों और बिछौने पर सजी हुई दिखाई देती थी। समय के साथ यही सुई-धागे का जादू बिहार की महिलाओं के सशक्तिकरण और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बन गया। आज सुजनी कढ़ाई गांवों से निकलकर फैशन की दुनिया तक अपना सफर तय कर चुकी है। जहां यह सिलाई का हुनर फैशन ट्रेंड बन कर अब नवजात बच्चों के बिछौनों से आगे बढ़कर पोशाकों पर भी नजर आने लगा है। यह सिलाई सिर्फ एक कला नहीं, बल्कि बिहार की पहचान बन चुकी है। आइए जानते हैं सुजनी कढ़ाई की व्यापकता और इससे जुड़े इतिहास के बारे में विस्तार से -

सुजनी कढ़ाई का इतिहास और परंपरा


सुजनी कढ़ाई की शुरुआत बिहार के मुंगेर और भुसरा इलाके से हुई। पुराने समय में जब किसी बच्चे का जन्म होता था, तो उसकी मां पुराने कपड़ों के टुकड़ों को जोड़कर एक रजाई तैयार करती थी। यह रजाई बच्चे के लिए केवल गर्माहट नहीं देती थी, बल्कि मां के दुलार और प्यार का प्रतीक मानी जाती थी।

हर कपड़े के टुकड़े को जोड़ने की प्रक्रिया को ‘सुजनी’ कहा गया। जिसका अर्थ है जोड़ना, मिलाना या एकरूप बनाना। माना जाता था कि इस रजाई में सिले हर टांके में मां अपने बच्चे के लिए शुभकामनाएं, सुरक्षा और लंबी उम्र की प्रार्थना करती है। यही वजह है कि सुजनी केवल कपड़ा नहीं, बल्कि भावनाओं की परंपरा बन गई ।

बेहद धैर्य मांगती है सुजनी कढ़ाई की बारीकी और बनाने की प्रक्रिया

सुजनी कढ़ाई अपनी सादगी और सुंदरता के लिए जानी जाती है। इसे बनाने की प्रक्रिया बहुत मेहनत और धैर्य मांगती है। सबसे पहले एक सादा सूती या रेशमी कपड़ा चुना जाता है। फिर उस पर नीले चाक और ट्रेसिंग शीट की मदद से डिज़ाइन बनाया जाता है।

इसके बाद बारीक रनिंग स्टिच (जिसे ‘कंथा’ कहा जाता है) से सिलाई शुरू होती है। ये सिलाई बहुत महीन होती है, जिससे कपड़े पर पैटर्न उभरकर सामने आता है। डिज़ाइन की रूपरेखा के लिए काले या भूरे धागे का इस्तेमाल होता है और अंदर भरने के लिए लाल, पीले, नारंगी जैसे चमकीले रंगों के धागे लगाए जाते हैं। अंत में कपड़े के किनारों पर हेमिंग सिलाई करके उसे पूरा किया जाता है और मिट्टी के तेल से धोकर इस्त्री की जाती है ताकि नीले चाक के निशान मिट जाएं।

पारंपरिक सजनी कढ़ाई के बल्बों और उनके अर्थ

सुजनी कढ़ाई में बने बेलबूटे केवल सजावट नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक अर्थ भी रखते हैं। सबसे पुराने और प्रसिद्ध डिज़ाइनों में सूर्य, बादल, पेड़ और पक्षियों के रूपांकन शामिल हैं। सूर्य जीवन और ऊर्जा का प्रतीक है, जबकि बादल सृजन और पुनर्जन्म का। इसके अलावा, देवी-देवताओं, जानवरों, फूलों और ज्यामितीय आकृतियों के डिज़ाइन भी बनाए जाते हैं, जो बुरी शक्तियों से बचाव और सौभाग्य का संकेत देते हैं। पारंपरिक रूप से लाल और पीले रंगों को शुभ माना जाता है। जिसमें लाल रंग जीवन और शक्ति का प्रतीक है, जबकि पीला सूर्य और समृद्धि का। समय के साथ सुजनी कढ़ाई में आधुनिक डिज़ाइन भी शामिल हो गए हैं। आज इसमें पेड़-पौधे, फूल, पत्तियां, ग्रामीण जीवन और सामाजिक संदेशों के चित्र भी देखने को मिलते हैं।

सजनी कढ़ाई बनी महिला सशक्तिकरण की प्रेरक कहानी

बीसवीं सदी तक आते-आते सुजनी कढ़ाई धीरे-धीरे खत्म होने लगी थी। लेकिन 1988 में मुंगेर की निर्मला देवी ने इसे फिर से जीवित किया। उन्होंने महिला विकास सहयोग समिति (MVSS) के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को प्रशिक्षण दिया और उन्हें इस पारंपरिक कला के जरिए आत्मनिर्भर बनाया।

अब महिलाएं सिर्फ बेबी रजाई नहीं, बल्कि बेडस्प्रेड, टेबल क्लॉथ, वॉल हैंगिंग, कुशन कवर और साड़ियां बनाने लगीं। इस कला के पुनर्जीवन ने न केवल ग्रामीण महिलाओं को रोजगार दिया, बल्कि उन्हें अपनी रचनात्मकता दिखाने का मंच भी मिला।

समाज में बदलाव की कहानी बयां कर रही आज की सुजनी कढ़ाई

समय के साथ सुजनी कढ़ाई सिर्फ परंपरा नहीं रही, बल्कि सामाजिक संदेशों की भाषा बन गई। ग्रामीण महिलाएं अब इस कढ़ाई के जरिये अपने आस-पास के मुद्दों को भी कपड़े पर उकेरती हैं।

उनके डिज़ाइनों में लड़कियों की शिक्षा, घरेलू हिंसा, बाल विवाह, महिला अधिकार, पर्यावरण संरक्षण और समानता जैसे विषय झलकते हैं। इस तरह सुजनी अब समाज में बदलाव की कहानी बयां करने का भी माध्यम बन चुकी है। इस कला का हर धागा अब सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि महिलाओं की सोच और संवेदना की अभिव्यक्ति का जारिया भी बन गया है।

टैग प्राप्त करने के साथ बनी वैश्विक पहचान

आज सुजनी कढ़ाई बिहार की जीआई (Geographical Indication) टैग प्राप्त कला है। यह न केवल भारत में, बल्कि यूरोप, जापान और अमेरिका जैसे देशों में भी लोकप्रिय हो चुकी है।

कई प्रसिद्ध फैशन डिजाइनर अपने परिधानों में सुजनी कढ़ाई का प्रयोग कर रहे हैं। FabIndia, Taneira, Jaypore जैसे ब्रांड इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में लेकर जा चुके हैं।

सरकार और कई एनजीओ इस कला से जुड़े क्लस्टर प्रोजेक्ट चला रहे हैं, जिनसे सैकड़ों महिलाएं रोजगार पा रही हैं। इससे बिहार की पारंपरिक कला को नया जीवन और वैश्विक मंच मिला है।

आज सुजनी कढ़ाई बिहार की मिट्टी, संस्कृति और स्त्री-शक्ति का जीवंत प्रतीक बन कर विश्विक पटल पर अभी चमक बिखेर रही है।

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Jyotsana Singh is an Tech/Auto and Tourism Desk Content Writer at Newstrack.com.

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