Maulana Abul Kalam Azad: जिनकी सोच से जन्मी थी भारत की आधुनिक शिक्षा नीति

The Visionary Behind India’s Modern Education System: मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने शिक्षा को समानता और प्रगति का साधन माना। उनकी सोच ने भारत की आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की नींव रखी।

Jyotsana Singh
Published on: 11 Nov 2025 4:16 PM IST
Maulana Abul Kalam Azad: जिनकी सोच से जन्मी थी भारत की आधुनिक शिक्षा नीति
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Maulana Abul Kalam Azad

राष्ट्रीय शिक्षा दिवस : भारत की धरती हमेशा से ही ज्ञान और अध्यात्म का अकूत भंडार रही है। लेकिन शिक्षा की अलख को जलाने और इसके प्रकाश को बढ़ाने का जिम्मा अब तक कई विख्यात हस्तियों ने बखूबी उठाया है। जिसमें से एक नाम मौलाना अबुल कलाम का भी आता है। हर साल 11 नवंबर को भारत का हर शिक्षण संस्थान एक महान विचारक, एक सच्चे राष्ट्रनिर्माता और शिक्षा के प्रतीक मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को याद करता है। उस व्यक्ति के सम्मान में जिसने आज़ाद भारत को ज्ञान की रोशनी से जगमगाने का सपना देखा था। मौलाना आज़ाद की जयंती के इस दिन को हम राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में मनाते हैं। मौलाना आज़ाद का मानना था कि शिक्षा सिर्फ डिग्री पाने का साधन नहीं, बल्कि समाज में समानता और प्रगति की सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने देश के हर बच्चे तक शिक्षा पहुंचाने, विश्वविद्यालयों की नींव मजबूत करने और संस्कृति व विज्ञान के बीच संतुलन बनाने की दिशा में ऐतिहासिक काम किया। आज जब हम आधुनिक भारत की शिक्षा व्यवस्था पर नज़र डालते हैं, तो उसकी जड़ें इन्हीं के विचारों का परिणाम बनकर आज फलफूल रही है।

पत्रकारिता से भी जुड़े थे मौलाना अबुल कलाम आज़ाद

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का जन्म 11 नवंबर 1888 को मक्का में हुआ था। उनके पिता मौलाना खैरुद्दीन एक प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान थे और उनकी माता अरब की मूल निवासी थीं। उनका परिवार बाद में भारत आकर कोलकाता में बस गया। बचपन से ही अबुल कलाम बुद्धिमान और जिज्ञासु स्वभाव के थे। उन्होंने बहुत कम उम्र में ही अरबी, फारसी, उर्दू और अंग्रेज़ी भाषाओं में महारत हासिल कर ली थी।

उन्होंने लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बनाई। उन्होंने ‘अल-हिलाल’ और ‘अल-बलाघ’ नाम के अख़बार निकाले, जिनके जरिए उन्होंने लोगों में देशभक्ति और स्वतंत्रता की भावना जगाई। यही वजह है कि उनकी तुर्श लेखनी ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जनता की मजबूत आवाज़ बन गई। जिसने हिंदुस्तान की धरती पर अंग्रेजी हुकूमत की जड़ों को हिलाकर कर रख दिया था।

अबुल कलाम आज़ाद की स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका

अबुल कलाम आज़ाद न सिर्फ एक शिक्षाविद थे बल्कि एक स्वतंत्रता सेनानी भी थे। उन्होंने गांधीजी के साथ मिलकर असहयोग आंदोलन और खिलाफत आंदोलन में भाग लिया। वह धर्म के आधार पर देश के बंटवारे के विरोधी थे और हमेशा हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्षधर रहे। उनका मानना था कि भारत की असली ताकत उसकी विविधता और एकता में है।

वे कहते थे कि, 'भारत की संस्कृति साझा है, इसे किसी दीवार से अलग नहीं किया जा सकता।'

उनकी इसी देशप्रेम से जुड़ी राष्ट्रवादी सोच और सभी वर्गों को एक सूत्र में बांधने की विचारधारा ने उन्हें जनता के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया था।

पहले शिक्षा मंत्री के रूप में योगदान

भारत को आज़ादी मिलने के बाद 15 अगस्त 1947 को मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को देश का पहला शिक्षा मंत्री नियुक्त किया गया। उन्होंने 2 फरवरी 1958 तक इस पद पर रहते हुए भारतीय शिक्षा व्यवस्था की नींव रखी। उनके कार्यकाल में देश में कई महत्वपूर्ण शैक्षणिक और तकनीकी संस्थानों की स्थापना हुई। जिनमें से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC), जो विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता सुनिश्चित करता है।

अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE), जिसने तकनीकी शिक्षा को संगठित रूप दिया।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT), जिसने भारत को विश्व स्तर की तकनीकी शिक्षा में पहचान दिलाई। वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR), जो वैज्ञानिक शोध और नवाचार को प्रोत्साहित करती है, आदि संस्थानों की नींव रखी। इसके पीछे उनका विश्वास था कि एक राष्ट्र की असली पूंजी उसकी जनता का ज्ञान और शिक्षा है।

शिक्षा को सबके लिए सुलभ बनाना था मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का सपना

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का सपना था कि देश का कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे। उन्होंने 14 वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए निशुल्क और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा का प्रस्ताव रखा। उनका मानना था कि अगर हर बच्चा शिक्षित होगा, तो देश खुद-ब-खुद प्रगति करेगा।

उनकी यही सोच आगे चलकर शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) की नींव बनी। वे शिक्षा को केवल रोज़गार का माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और नागरिक जिम्मेदारी का साधन मानते थे। उनके अनुसार, 'शिक्षा का मकसद इंसान को सोचने, समझने और सही निर्णय लेने की क्षमता देना है।'

संस्कृति, साहित्य और कला के विकास में योगदान

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का मानना था कि शिक्षा केवल विज्ञान या तकनीक तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसमें कला, संस्कृति और साहित्य का भी समावेश होना चाहिए। उनके प्रयासों से भारत में कई प्रमुख सांस्कृतिक संस्थानों की स्थापना हुई। इनमें साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी और संगीत नाटक अकादमी शामिल हैं।

इन संस्थानों ने भारतीय भाषाओं, कलाओं और संगीत को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई। आज भी ये संस्थान देश के सांस्कृतिक विकास के केंद्र बने हुए हैं।

आधुनिक भारत में उनके विचारों की प्रासंगिकता

आज जब भारत शिक्षा के क्षेत्र में नितनई ऊंचाइयों को छूने की कोशिश कर रहा है और नई शिक्षा नीति (NEP) लागू कर रहा है। ऐसे में मौलाना आज़ाद की शिक्षा के विकास को लेकर सोच पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गई है। वे मानते थे कि शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ नौकरी पाना नहीं है, बल्कि एक ऐसे नागरिक का निर्माण करना है जो देश और समाज के प्रति जिम्मेदार हो। उनके विचार हमें बताते हैं कि एक शिक्षित समाज ही सशक्त राष्ट्र की पहचान होता है। उन्होंने हमेशा शिक्षा में समानता, नैतिकता और वैज्ञानिक सोच पर जोर दिया।

क्या है राष्ट्रीय शिक्षा दिवस मनाने का उद्देश्य

भारत सरकार ने 2008 में यह घोषणा की कि मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की जयंती को हर साल राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इस दिन का उद्देश्य सिर्फ उन्हें श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि शिक्षा के महत्व को रेखांकित करना और युवाओं को प्रेरित करना है। इस दिन देश भर के स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में इस अवसर पर सेमिनार, भाषण प्रतियोगिताएं, रैलियां और निबंध लेखन जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं। इसका मकसद यह संदेश देना है कि शिक्षा सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि एक बेहतर समाज बनाने का माध्यम है।

आज भी कायम है मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की विरासत

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का निधन 22 फरवरी 1958 को दिल्ली में हुआ। उनकी स्मृति में दिल्ली की एक प्रमुख सड़क का नाम ‘मौलाना आज़ाद रोड’ रखा गया है। उनके असाधारण योगदान के सम्मान में उन्हें 1992 में मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

उनकी दूरदर्शिता और समर्पण ने भारत को एक मजबूत शैक्षिक और सांस्कृतिक पहचान दी। उन्होंने जो शिक्षा की नींव रखी, वही आज भारत की तरक्की और प्रगति का आधार बनी हुई है।

डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी ऐतिहासिक तथ्यों, सरकारी अभिलेखों और विश्वसनीय स्रोतों पर आधारित है। इसका उद्देश्य पाठकों को मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के जीवन, उनके योगदान और राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के महत्व के बारे में जागरूक करना है। इसमें व्यक्त विचार केवल जानकारी प्रदान करने हेतु हैं। लेख का किसी राजनीतिक या धार्मिक दृष्टिकोण से कोई संबंध नहीं है।

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Jyotsana Singh is an Tech/Auto and Tourism Desk Content Writer at Newstrack.com.

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