UP Politics News: क्या बिहार मॉडल उत्तर प्रदेश में भाजपा को फिर सत्ता दिला सकता है?

UP Mein Kiski Sarkar Banegi: अब प्रश्न यह है कि क्या यही ‘ बिहार मॉडल’ उत्तर प्रदेश में भाजपा को 2027 में फिर सत्ता दिला सकता है?

Yogesh Mishra
Published on: 15 Nov 2025 4:12 PM IST
Bihar Model BJP UP Election 2027 Strategy Analysis Uttar Pradesh Mein Kiski Sarkar Banegi
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Bihar Model BJP UP Election 2027 Strategy Analysis Uttar Pradesh Mein Kiski Sarkar Banegi

UP Mein Kiski Sarkar Banegi: बिहार में भाजपा–एनडीए की अप्रत्याशित और ऐतिहासिक जीत को बहुत लोग सिर्फ़ ‘महिला वोट’, ‘डबल इंजन सरकार’ या ‘जंगलराज’ जैसे सतही शब्दों से समझने की कोशिश करते हैं, जबकि वास्तविकता कहीं अधिक जटिल और गहरी है। बिहार चुनाव की केंद्रीय कहानी केवल मोदी–नीतीश की लोकप्रियता की नहीं थी। यह एक ऐसी सामाजिक–राजनीतिक इंजीनियरिंग की कहानी थी, जिसने जातीयता को अस्वीकार नहीं किया। बल्कि उसे पुनर्गठित करके उसमें विकास, स्थिरता, और कल्याणकारी राज्य का एक नया अर्थ जोड़ दिया। भाजपा और जदयू ने ओबीसी–ईबीसी–महादलित–पसमांदा–महिला–लाभार्थी जैसी बिखरी और पारंपरिक रूप से राजनीतिक रूप से अव्यवस्थित वर्गों को एक नए ‘राजनैतिक परिवार’ में बदला, और विपक्ष के कोर जातीय–धार्मिक गठजोड़ को तीन दिशाओं में तोड़ दिया। AIMIM ने मुस्लिम वोट का एक तिहाई काट लिया। कांग्रेस अपने परंपरागत पॉकेट में सीमित हो गई, और राजद अपने ही यादव–बेस पर सीमित होकर एक बड़े सामाजिक ताने-बाने को गढ़ने में असफल रही।

अब प्रश्न यह है कि क्या यही ‘ बिहार मॉडल’ उत्तर प्रदेश में भाजपा को 2027 में फिर सत्ता दिला सकता है? राजनीतिक भूगोल, जनसांख्यिकी, युवाओं का असंतोष, दलितों में नेतृत्व की माँग और सपा–कांग्रेस गठबंधन की बदली हुई ऊर्जा जैसी अनेक चुनौतियों के बावजूद इसका उत्तर सीधे-सीधे ‘नहीं’ नहीं है। बल्कि सच्चाई यह है कि अगर भाजपा बिहार मॉडल को ज्यों का त्यों नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना और राजनीतिक मनोविज्ञान के अनुसार अनुवादित, अनुकूलित और विस्तारित करती है, तो वह यूपी में 2027 की लड़ाई में एक बार फिर निर्णायक जगह बना सकती है।

उत्तर प्रदेश और बिहार के बीच सबसे बड़ा अंतर यह है कि बिहार में भाजपा–एनडीए ‘चैलेंजर’ की पोज़ीशन में था। यानी उसके पास खोने को बहुत कम था और पाने को बहुत अधिक। मोदी–नीतीश कॉम्बिनेशन ने ‘स्थिरता प्लस बदलाव’ का एक अनोखा पैकेज बेचकर मतदाताओं के मन में वह भरोसा पैदा किया कि वे राज्य को एक ऐसे मॉडल में बदल रहे हैं जहाँ अपराध, अनिश्चितता और जातीय वर्चस्व की राजनीति की जगह एक अधिक स्थिर और संस्थागत शासन व्यवस्था स्थापित हो रही है। लेकिन उत्तर प्रदेश में भाजपा अब दस वर्ष से शासन में है। यह ‘स्टेबिलिटी’ तो दे सकती है, पर ‘चेंज’ के फ्रेम में खुद को नहीं बेच सकती। इसलिए बिहार मॉडल को यूपी में लागू करते समय भाजपा को सबसे पहले अपनी ही सरकार के खिलाफ़ खड़ी हुई थकान, नाराज़गी, बेरोज़गारी, पेपर लीक, दलित असंतोष, और ब्राह्मणों के मन में बैठे असुरक्षा भाव जैसी वास्तविकताओं का सामना करना होगा। यह यूपी–वर्ज़न का पहला अनिवार्य सुधार है — विजय का मॉडल नहीं, सुधार का मॉडल।

बिहार मॉडल की पहली बड़ी ताक़त थी — EBC और गैर–यादव OBC की गहरी राजनीतिक सक्रियता और प्रतिनिधित्व। भाजपा ने इन वर्गों को न सिर्फ़ टिकट दिए, बल्कि उनके नेताओं को स्थानीय प्रशासन, संगठन और राज्य की राजनीतिक चर्चा में भी महत्वपूर्ण भूमिका दी। उत्तर प्रदेश में यह बात निर्णायक हो सकती है, क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की हार का सबसे बड़ा कारण यही था कि गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलितों में भाजपा की पकड़ ढीली पड़ चुकी थी। यह वर्ग एक बड़े पैमाने पर सपा–कांग्रेस के सामाजिक न्याय 2.0 के नैरेटिव से आकर्षित हुआ। अगर भाजपा बिहार मॉडल को यूपी में दोहराना चाहती है, तो उसे कुर्मी, कोइरी, सैनी, मौर्य, निषाद, लोध, गडरिया, तंवर और दलित समुदायों में नेतृत्व की वास्तविक हिस्सेदारी देनी होगी — सिर्फ़ सम्मान समारोह, मंच की कुर्सियाँ और फोटो खिंचवाने भर से नहीं। बिहार का संदेश साफ़ है— जो समाज को प्रतिनिधित्व देता है, वही समाज से वोट लेता है। यूपी में यह असंतुलन जितनी जल्दी सुधारा जाएगा, उतना बड़ा राजनीतिक लाभ भाजपा उठा सकती है।

दूसरी बड़ी सीख है — महिलाएँ प्लस लाभार्थी वर्ग। यह आज भाजपा का सबसे विश्वसनीय और सबसे स्थिर वोट बैंक है। बिहार में महिलाओं ने जिस बड़े पैमाने पर एनडीए को वोट दिया, उसका कारण सिर्फ़ ‘सुरक्षा’ नहीं था। यह कारण था — रसोई गैस, राशन, शौचालय, बिजली, आवास, छात्रवृत्ति, वृद्धावस्था पेंशन, विधवा सहायता, जनधन, किसान सम्मान — यानी पूरी एक कल्याणकारी अर्थव्यवस्था। यूपी में यदि भाजपा इन योजनाओं को और अधिक व्यक्तिगत, अधिक स्थानीय और अधिक महिलाओं की भाषा में ट्रांसलेट करती है, तो वह बिहार जैसा असर पैदा कर सकती है। हर बूथ पर, हर गाँव में, हर वार्ड में महिलाओं को केंद्र में रखकर चुनावी संवाद बनाना होगा। यह आज भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक पूँजी है, क्योंकि विपक्ष के पास इस वर्ग के लिए कोई प्रतिद्वंद्वी मॉडल नहीं है।

तीसरी सीख — स्थिरता बनाम अराजकता का नैरेटिव। बिहार में राजद के ‘जंगलराज’ को भाजपा ने सिर्फ़ भावनात्मक शब्द की तरह नहीं, बल्कि प्रशासनिक डेटा, स्थानीय घटनाओं, अपराध व कानून-व्यवस्था की तुलना और लाभार्थी वर्ग के भरोसे की भाषा के साथ पेश किया। उत्तर प्रदेश में यह नरेटिव सपा के शासनकाल की यादों, दंगों, पुलिस व्यवस्था की कमजोरी और कुछ जिलों में माफ़ियाओं के दबदबे के रूप में पहले भी काम कर चुका है। लेकिन 2027 में इसका प्रभाव तभी होगा, जब भाजपा इसे पुराने फ्रेम में नहीं, बल्कि “योगी मॉडल बनाम SP-Congress का अनिश्चित मॉडल” के रूप में पैक करेगी। यानी भाजपा को यह दिखाना होगा कि जो स्थिरता, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक क्षमता 2017 के बाद बनी, वह आगे सपा- कांग्रेस की सरकार में लौटेगी या टूटेगी। यह नरेटिव जितना डेटा आधारित होगा, उतना असरकारी रहेगा।

चौथी सीख — युवा और बेरोज़गारी को सिर्फ़ नारों से नहीं, ठोस समयबद्ध कार्यक्रम से संबोधित करना। बिहार में भाजपा ने बेरोज़गारी के मुद्दे को महिलाओं–लाभार्थियों के ज़रिए neutralize किया, लेकिन यूपी में युवा वर्ग कहीं अधिक बड़ा, अधिक राजनीतिक और अधिक बेचैन है। 2024 का बड़ा संदेश यही था कि यदि भाजपा युवाओं की उम्मीदों को गंभीरता से नहीं लेगी, तो वे सत्ता को बदलने में संकोच नहीं करेंगे। इसलिए यूपी मॉडल में यह बिहार की तुलना में एक ‘ मिसिंग लिंक’ है, जिसे भरना ही पड़ेगा। भर्ती कैलेंडर, पेपर-लीक पर ज़ीरो टॉलरेंस, MSME स्टार्टअप जोन, कृषि आधारित ग्रामीण उद्योग और कौशल आधारित नौकरियों का एक बड़ा, स्पष्ट और measurable रोडमैप — यह वह कदम है जिसे भाजपा यदि समय रहते उठाती है, तो बिहार मॉडल यूपी में बिल्कुल फिट बैठ सकता है।

पाँचवीं सीख — NDA का ‘चौड़ा गठबंधन’ बनाना। बिहार में LJP(RV), HAM, RLJP, और जदयू ने भाजपा को संरचनात्मक मजबूती दी। यूपी में अभी एनडीए का ढाँचा संकरा है — अपना दल(एस), सुहेलदेव पार्टी और निषाद पार्टी तक सीमित। 2027 में भाजपा को इस मॉडल को चौड़ा करना होगा। छोटे ओबीसी दलों, दलित नेतृत्व, और क्षेत्रीय सामाजिक समूहों को शामिल करके भाजपा ‘ अकेली बनाम सभी’ वाली छवि से बाहर निकल सकती है और बिहार जैसे गठबंधन-इंजीनियरिंग से सीटों की क्षति को रोक सकती है।

इस पूरे तर्क का निष्कर्ष यह है कि— बिहार मॉडल एक ट्रांसफर्रेबल मॉडल है, लेकिन यूपी में इसका ट्रांसफ़र केवल तभी सफल हो सकता है जब भाजपा बिहार की जीत को आत्ममुग्धता नहीं, बल्कि चेतावनी और अवसर दोनों की तरह पढ़े। उत्तर प्रदेश का चुनाव 2027 भाजपा के लिए सिर्फ़ सत्ता-रक्षा की लड़ाई नहीं, बल्कि अपने ही पिछले दशक की राजनीति के पुनर्निर्माण का अवसर है। यदि भाजपा गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलित ब्लॉक को नया नेतृत्व देती है, महिलाओं–लाभार्थियों के साथ अधिक गहरी सामाजिक साझेदारी बनाती है, सपा कांग्रेस के नैरेटिव का तर्कपूर्ण काउंटर प्रस्तुत करती है और युवाओं के लिए ठोस, समयबद्ध आर्थिक कार्यक्रम पेश करती है, तो बिहार मॉडल न केवल यूपी में दोहराया जा सकता है, बल्कि और भी बड़े पैमाने पर काम कर सकता है। पर यदि भाजपा ने इन बुनियादी सुधारों को अनदेखा किया, तो वही उत्तर प्रदेश, जिसने 2024 में उसे झटका दिया, 2027 में निर्णायक रूप से राजनीतिक परिदृश्य को बदल भी सकता है।

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Yogesh Mishra

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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