KGMU: डॉक्टर बने भगवान! साढ़े आठ किलो का ट्यूमर हटाकर बचा ली महिला की जान

डॉ. सौम्या सिंह के नेतृत्व में टीम ने किडनी सुरक्षित रख सफल ऑपरेशन किया

Newstrack Network
Published on: 29 Aug 2025 6:29 PM IST
KGMU doctors
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KGMU doctors save woman’s life by removing 8.5 kg tumor (image from Social Media)

Lucknow News: राजधानी किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के सर्जरी विभाग के डॉक्टरों ने 51 वर्षीय महिला का जटिल ऑपरेशन कर 8 किलों का ट्यूमर निकाला है। जो मरीज के लिवर, किडनी, आंत समेत दूसरे अंगों पर दबाव डाल रहा था। मरीज के अस्पताल पहुंचने के बाद डॉक्टरों द्वारा की गई जांच पड़ताल में ट्यूमर होने की पुष्टि की गई। जिसके बाद ऑपरेशन कर सभी अंगों को बचाकर ट्यूमर को बाहर निकालने में डॉक्टरों की टीम ने कामयाबी हासिल की है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश निवासी (51) वर्षीय महिला को पेट में दर्द की शिकायत हुई। पाचन क्षमता कमजोर हो रही थी। स्थानीय डॉक्टरों को दिखाया। डॉक्टरों ने मरीज की हालत गंभीर बताई। उन्हें केजीएमयू रेफर कर दिया। परिवारीजन मरीज को लेकर केजीएमयू पहुंचे। यहां सर्जरी विभाग की डॉ. सौम्या ने मरीज को देखा। जांच कराई। जिसमें साढ़े आठ किलोग्राम के ट्यूमर की पुष्टि हुई। डॉ. सौम्या ने बताया कि ट्यूमर की वजह से मरीज के दाहिनी किडनी को लिवर की तरफ धकेल रहा था। आंत व पेट के हिस्से पर भी दबाव पड़ रहा था। शरीर की सबसे मोटी नस इन्फीरियर वेना कावा को भी प्रभावित कर रहा था। यह नस पूरे शरीर को खून की आपूर्ति करता है। उन्होंने बताया कि जांच में पता चला ट्यूमर जायंट रिकरेंट रेट्रोपेरिटोनियल लिपोसारकोमा से पीड़ित थी। वह एक दुर्लभ और आक्रामक सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा से पीड़ित थीं। आठ साल पहले महिला को यही ट्यूमर हुआ था।

अंगों को बचाना थी बड़ी चुनौती

ड़ॉ. सौम्या ने बताया कि ट्यूमर निकालने के साथ अंगों का बचाना चुनौती थी। इसके बावजूद डॉक्टरों ने ट्यूमर को हटाने और किडनी को सुरक्षित रखने में सफलता पाई। करीब 15 से 20 हजार रुपये में पूरा इलाज पर खर्च हुए है। प्रवक्ता डॉ. केके सिंह व डॉ. जितेंद्र कुशवाहा ने बताया कि एक लाख में दो से पांच लोग इस सारकोमा की चपेट में आते हैं।


यह 35 × 25 × 14 सें.मी. का और लगभग 8.5 किलोग्राम वज़नी ट्यूमर था। जो चुपचाप बढ़कर इतना विशाल हो गया था कि इसने दाहिनी किडनी को लिवर के पास मध्य रेखा की ओर धकेल दिया था, कोलन और डुओडेनम को दबा दिया था, पेरिनेफ्रिक फैट प्लेन, दाहिनी रीनल वेन और यहां तक कि इन्फीरियर वेना कावा को भी प्रभावित कर दिया था। ट्यूमर के अत्यधिक आकार ने रोगी में लम्बर लॉर्डोसिस भी उत्पन्न कर दी थी। स्थिति को और जटिल बनाते हुए, प्रिऑपरेटिव राइट DJ स्टेंटिंग यूरटर की टॉर्च्यूसिटी के कारण विफल हो गई, जिससे नेफ्रेक्टॉमी (किडनी निकालने)का गंभीर ख़तरा था। इसके बावजूद, केजीएमयू की सर्जिकल टीम ने संपूर्ण ट्यूमर को हटाने और किडनी को सुरक्षित रखने में सफलता पाई—जो शल्य-कौशल और सावधानीपूर्वक योजना का उत्कृष्ट उदाहरण है।

1अगस्त 2025 को की गई इस शल्यक्रिया में शामिल था:ट्यूमर का व्यापक निष्कासन टर्मिनल इलियम और असेंडिंग कोलन का रिसेक्शन,ट्यूमर से घिरी एक्सटर्नल इलियक आर्टरी की मरम्मत। यह अत्यंत जटिल मामला कई बाधाओं से भरा था—आठ वर्ष बाद ट्यूमर का पुनः उभरना, मल्टी-विसरल और वैस्कुलर इन्वॉल्वमेंट, गंभीर कैक्ज़िया (वज़न 55 किग्रा से घटकर 41 किग्रा) और प्रमुख इंट्रा-ऑपरेटिव व पोस्ट-ऑपरेटिव जटिलताओं का जोखिम।

फिर भी, पूरी प्रक्रिया—जिसमें ICU देखभाल और चार यूनिट रक्त चढ़ाना शामिल था—सिर्फ ₹5,600 प्रत्यक्ष शल्य खर्च (कुल अस्पताल व्यय: ₹15,000–20,000) में संपन्न हुई। यह सिद्ध करता है कि केजीएमयू जैसे सार्वजनिक संस्थान निजी क्षेत्र की तुलना में बहुत कम लागत पर विश्वस्तरीय परिणाम दे रहे हैं।


ऑपरेशन के बाद रोगी स्वस्थ हो गईं और उनकी किडनी सुरक्षित रही। विशेषज्ञ बताते हैं कि यद्यपि रेट्रोपेरिटोनियल लिपोसारकोमा दुर्लभ होते हैं (प्रति 1 लाख जनसंख्या पर 2–5 मामले), यह सारकोमा का एक महत्वपूर्ण उपसमूह है और इनकी पुनरावृत्ति की संभावना अधिक रहती है क्योंकि ये रेट्रोपेरिटोनियल स्पेस में चुपचाप बढ़ते रहते हैं जब तक कि महत्वपूर्ण अंगों को प्रभावित न कर दें।

इस सफलता का श्रेय बहु-विषयक टीम वर्क को जाता है, जिसका नेतृत्व डॉ. सौम्या सिंह (अतिरिक्त प्रोफेसर, सर्जरी) ने किया। टीम में डॉ. विजय (SR), डॉ. स्वप्निल (JR3), डॉ. अहमर (JR2) शामिल रहे। इन्हें प्रो. परीजात (सर्जरी) और डॉ. अवनीत गुप्ता (यूरोलॉजी) तथा डॉ. उज्जवल जैन (SR, यूरोलॉजी) का सहयोग मिला। एनेस्थीसिया टीम का नेतृत्व डॉ. नेहा ने किया, जबकि ICU देखभाल की ज़िम्मेदारी डॉ. विपिन सिंह (अतिरिक्त प्रोफेसर, एनेस्थीसिया) ने संभाली। पूरी टीम ने प्रो. जे.के. कुशवाहा और प्रो. के.के. सिंह के मार्गदर्शन तथा माननीय कुलपति के नेतृत्व में प्रशासनिक सहयोग को भी सराहा।

यह मामला स्पष्ट करता है कि समय पर पहचान, सटीक इमेजिंग, पुनः शल्यक्रिया और बहु-विषयक सहयोग दुर्लभ, आक्रामक ट्यूमर के रोगियों के जीवन और उनकी गुणवत्ता सुधारने में अत्यंत आवश्यक हैं। सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि उच्चतम स्तर की जीवनरक्षक सर्जरी—जिसमें अत्यधिक कौशल और धैर्य की आवश्यकता होती है—अब भी करुणा और किफ़ायत के साथ आम रोगियों तक पहुँचाई जा सकती है।

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