Mahoba News: महोबा की मोहर्रम परंपरा: भट्टीबाबा का लंगड़ लुटाने की अनोखी रस्म

Mahoba News: मोहर्रम की 10 तारीख को दोपहर दो बजे निकाले जाने वाला यह ताजिया गश्त जिले ही नहीं बल्कि पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र में विशेष महत्व रखता है।

Imran Khan
Published on: 6 July 2025 6:51 PM IST
Mahoba News: महोबा की मोहर्रम परंपरा: भट्टीबाबा का लंगड़ लुटाने की अनोखी रस्म
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महोबा की मोहर्रम परंपरा  (photo: social media )

Mahoba News: महोबा जनपद की ताजियादारी अपनी अलग पहचान रखती है, लेकिन शहर के भटीपुरा मोहल्ले में निकलने वाला भट्टीबाबा ताजिया न सिर्फ धार्मिक आस्था बल्कि अनोखी परंपराओं के लिए भी जाना जाता है। मोहर्रम की 10 तारीख को दोपहर दो बजे निकाले जाने वाला यह ताजिया गश्त जिले ही नहीं बल्कि पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र में विशेष महत्व रखता है।

इस ताजिया गश्त की सबसे खास और भीड़ आकर्षित करने वाली परंपरा है। अनोखा लंगड़, जिसे बांटा नहीं जाता बल्कि लुटाया जाता है। भटीपुरा की गलियों और इमाम चौकों पर जैसे ही ताजिया पहुंचता है, श्रद्धालु अपनी-अपनी छतों से लंगड़ लुटाना शुरू कर देते हैं। छतों से नीचे गिराए जाने वाले इस लंगड़ में नारियल, बर्तन, लड्डू, नमकीन, बिस्किट, चिप्स और यहां तक कि कोल्डड्रिंक की बोतलें तक शामिल होती हैं।

लंगड़ पाने के लिए हजारों की संख्या में लोगों की भीड़

जैसे ही लंगड़ लुटाया जाने लगता है, हजारों की संख्या में लोगों की भीड़ उसे पाने के लिए दौड़ पड़ती है। बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और युवा हर कोई इस लंगड़ को पाने की कोशिश में जुट जाता है। इस दौरान हल्की फुल्की चोटें भी लगती हैं लेकिन लोगों की आस्था और उत्साह में कोई कमी नहीं आती। इस पूरे आयोजन का नजारा अद्भुत होता है। न सिर्फ स्थानीय लोग बल्कि आसपास के गांवों और जिलों से भी श्रद्धालु इसे देखने और हिस्सा लेने पहुंचते हैं। मोहल्ले में मौजूद इमामबाड़ा के सरपरस्त मुन्ना वकील खानसाहब बताते हैं कि यह परंपरा पांच सौ साल से भी पुरानी है, जिसे उनके पूर्वजों ने शुरू किया था और अब अगली पीढ़ियां उसे पूरे सम्मान और श्रद्धा के साथ निभा रही हैं।

भट्टीबाबा का ताजिया गश्त समाप्त होते ही शहर की तमाम ताजियों के जुलूस निकलते हैं, जिनकी सरपरस्ती में भट्टीबाबा का ताजिया सबसे पीछे रखा जाता है। यह जुलूस पूरी रात गमगीन माहौल में चलता है। यह अनोखा लंगड़ और गश्त केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि संस्कृति, आस्था और जनसहभागिता का जीवंत प्रतीक बन चुका है।

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