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प्रकृति की कोमल छांव में छुपा हिमालय का दर्द, जिसे बचाना है हमें अपनी मोहब्बत से
हिमालय अपनी अद्भुत सुंदरता के लिए जाना जाता है, अपनी दुर्गम भौगोलिक संरचना और अप्रत्याशित स्वभाव के कारण कठोर और निर्मम भी हो सकता है।
हिमालय, ये नाम सुनते ही एक मन में उसकी अद्भुत सुंदरता के चित्र उभर आते हैं, लेकिन ये पहाड़ अपनी कठोरता और अप्रत्याशित व्यवहार से कभी-कभी बेजुबां और निर्दयी भी हो जाते हैं। हाल ही में उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धाराली गांव में आई बादल फटने की घटना ने फिर से ये याद दिला दिया कि हिमालय के नाजुक तंत्र में प्रकृति की ताकत को समझना और उसका सम्मान करना कितना ज़रूरी है।
5 अगस्त की दोपहर करीब 1:30 बजे अचानक आए एक भयंकर बाढ़ की लहर ने धाराली गांव को मात्र 47 सेकंड में बर्बाद कर दिया। भारी पत्थरों और मलबे से भरे इस जल प्रवाह ने पूरे इलाके को तहस-नहस कर दिया। यह विनाश इतना तेज़ और व्यापक था कि अब इसे ठीक होने में कई साल लगेंगे। इस घटना ने हम सबको हिमालय की विशाल और भयावह शक्ति का भयानक एहसास कराया।
लोगों की मदद के लिए की गई पुकारें और आसपास खड़े लोगों के जोरदार शोर-शराबे कोई फायदा नहीं कर पाए। एक पल में पूरा गांव इस भयानक आपदा की चपेट में आ गया, और जहां पहले हँसी-खुशी, ज़िन्दगी और रोज़गार थे, अब वहां सिर्फ़ पत्थर, मलबा और वीरानी बची है। करीब 20 एकड़ ज़मीन पर फैली इस तबाही में 500 से ज्यादा लोग, जिनमें दो बहादुर जूनियर कमीशन अधिकारी और नौ सैनिक भी शामिल हैं, अभी लापता हैं। उनकी किस्मत अब अनिश्चितता के अंधेरे में है। उनके घर, उनकी ज़िन्दगी और उनकी कहानियाँ अब मलबे में दफ़न हो गई हैं, जो प्रकृति की क्रूरता का साक्ष्य हैं।
यह त्रासदी पूरे समुदाय पर गहरा असर छोड़ गई है स्थानीय लोग, नेपाल और बिहार से आए मजदूर और करीब तीस होटलों व होमस्टे में ठहरे पर्यटक, सब बाढ़ की तेज़ धार में बह गए। अभी भी खोज और बचाव का काम जारी है और परिवार अपने प्रियजनों की खबर का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
ऐसे संकट के समय सरकार की तेज़ प्रतिक्रिया, सेना, एनडीआरएफ और एसडीआरएफ के सहयोग से बेहद अहम थी। लेकिन लगातार बारिश और तबाह हो चुके इंफ्रास्ट्रक्चर, रास्ते, पुल, संचार और बिजली नेटवर्क की खराब स्थिति ने राहत कार्यों को बहुत मुश्किल बना दिया।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने खुद राहत कार्यों की निगरानी की और बुरी परिस्थितियों के बावजूद प्रभावित इलाक़ों का दौरा किया। उन्होंने बचे हुए लोगों से मिलकर उन्हें सांत्वना दी और पूरा समर्थन देने का भरोसा दिलाया। सेना और एनडीआरएफ जैसी एजेंसियों के साथ तालमेल, प्रभावित परिवारों के लिए आर्थिक मदद की घोषणा और पुनर्वास के लिए एक समिति का गठन उनके द्वारा उठाए गए महत्वपूर्ण कदम थे। उनकी सहानुभूतिपूर्ण और सक्रिय नेतृत्व शैली ने प्रभावित समुदायों का हौसला बढ़ाया है।
सरकार की तुरंत मदद पहुंचाना ज़रूरी है, लेकिन उससे भी बड़ा काम है कि हम इन आपदाओं से सीख लें और भविष्य के लिए बेहतर तैयारी करें।
मेरा अपना जिला उत्तरकाशी भी कई भयानक प्राकृतिक आपदाओं का गवाह रहा है। 1976 की तबाही, 1983 के ग्यानसू इलाके में आई बाढ़, 1991 में आए भूकंप, और 2000 में वरुण-वत पहाड़ का डूब जाना इन घटनाओं ने हमें इस क्षेत्र की नाजुकता और तैयार रहने की ज़रूरत का एहसास दिलाया है।
इन आपदाओं को देखकर मैंने यह भी देखा है कि इंसानी हस्तक्षेप कैसे प्रकृति को नुकसान पहुंचाता है। 1976 की बाढ़ का कारण एक कृत्रिम झील बनाना और हरशल के आसपास बड़े पैमाने पर जंगल कटना था, जिससे भागीरथी नदी का जलस्तर बढ़ गया और UP के कई इलाक़े डूब गए। तबाही इतनी भयावह थी कि पुल मुड़ गए, सड़कें बह गईं, और बिजली- संचार व्यवस्था पूरी तरह से ठप हो गई।
ग्यानसू में आई बाढ़ का कारण अनधिकृत बस्तियां थीं। जंगल विभाग की संपत्ति होने के बावजूद, कई मजदूर और सब्जी विक्रेता वहां रह रहे थे। उन्होंने नदी के प्राकृतिक बहाव को रोक दिया, जिससे बारिश में अचानक आई बाढ़ ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया और कई लोगों की जान ले ली।
1991 के भूकंप ने जमक गांव में भारी तबाही मचाई, जहां परंपरागत लकड़ी और मिट्टी के बने घरों ने सिमेंट-सीमेंट के मकानों से कम नुकसान झेला। यह दर्शाता है कि स्थानीय और पारंपरिक निर्माण तकनीकें भूकंपीय क्षेत्रों में कितनी कारगर हो सकती हैं।
मेरे गांव बरसाली में बने पांच मंजिला पुराने घर 300 सालों से भी ज़्यादा समय से खड़े हैं, जो इस बात का प्रमाण हैं कि परंपरागत निर्माण तकनीकें पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ होती हैं।
परंपरागत बस्तियां नदी से दूर बनी हैं, जिससे बाढ़ का खतरा कम होता है और पानी भी स्वच्छ रहता है। लेकिन आधुनिकता के कारण लोग अब ढलानों और सड़क किनारे बस रहे हैं, जिससे बाढ़ की घटनाएँ बढ़ रही हैं।
वरुणावत के डूबने की समस्या उत्तरकाशी के लिए एक गंभीर चिंता है, जहां करीब तीन लाख लोग रहते हैं। इसके बावजूद नए घर बनाए जा रहे हैं, जिससे समस्या और बढ़ रही है। 2000 में ₹300 करोड़ की राशि भी जारी की गई थी, लेकिन स्थानीय लोग आरोप लगाते हैं कि यह पैसा सही ढंग से इस्तेमाल नहीं हुआ।
एक पत्रकार के रूप में मैंने इन सभी घटनाओं को करीब से देखा है। हर बार प्राकृतिक आपदा आने पर चिंता होती है, लेकिन बाद में वह सब भूल जाता है। लेट सुंदरलाल बहुगुणा के हिमालय संरक्षण के लिए किए गए प्रयास इस बात की प्रेरणा हैं कि हमें प्रकृति की आवाज़ सुननी चाहिए।
जलवायु परिवर्तन के कारण बादल फटना और बाढ़ जैसी आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है। इसलिए, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा है।
उत्तराखंड में सीमांत सड़कों के निर्माण ने भी पर्यावरणीय स्थिरता को चुनौती दी है। पहाड़ी इलाक़ों में लैंडस्लाइड और कटाव की संभावना बढ़ गई है। इसके लिए पर्यावरण के अनुकूल निर्माण और निरंतर निगरानी जरूरी है।
हमें विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाना होगा। प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को कम करने के लिए सही योजना, तकनीकी ज्ञान और स्थानीय समुदाय की भागीदारी अनिवार्य है।
हिमालय की सुंदरता को देखकर हर कोई मंत्रमुग्ध हो जाता है। इसे शिव का निवास माना जाता है, जो सत्य, शिव और सुंदरता का प्रतीक है। इसे केवल वाणिज्यिक लाभ के लिए नुकसान पहुँचाने के बजाय, हमें इसे उसी तरह प्यार, सम्मान और संजोना चाहिए जैसे हम किसी खूबसूरत महिला की करते हैं।
बर्फ से ढकी चोटियों पर सूरज की किरणें जब पीले से लेकर लाल रंग में नाचती हैं, तो यह एक अद्भुत दृश्य होता है। लेकिन यह दृश्य हमसे हमारी ज़िम्मेदारी भी माँगता है हिमालय की सुरक्षा, देखभाल और संरक्षण।
अब समय आ गया है कि हम इस प्राकृतिक चमत्कार की अहमियत समझें और उसे नष्ट करने से बचाएं। यही असली विकास होगा जो प्रकृति और मानव दोनों के लिए सतत और सुरक्षित हो।
लेखक अरविंद सिंह बिष्ट वरिष्ठ पत्रकार एवं उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त रह चुके हैं।


