प्रशांत किशोर की डूब गई नैय्या, Exit Poll के मुताबिक नहीं मिले जनसुराज को उम्मीद के मुताबिक परिणाम

प्रशांत किशोर की जनसभाओं में युवाओं की भारी भीड़ देखकर लग रहा था कि इस बार जनसुराज कम से कम तीसरी प्रमुख शक्ति के रूप में उभर सकती है, लेकिन किसी भी एग्जिट पोल में इसका कहीं संकेत नहीं मिल रहा है।

Shivam Shrivastava
Published on: 12 Nov 2025 8:03 PM IST
प्रशांत किशोर की डूब गई नैय्या, Exit Poll के मुताबिक नहीं मिले जनसुराज को उम्मीद के मुताबिक परिणाम
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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 ने एक बार फिर राज्य की राजनीति को जाति, गठबंधन और विकास के चक्र में उलझा दिया है। 6 और 11 नवंबर को दो चरणों में मतदान संपन्न होने के बाद, 14 नवंबर को होने वाली मतगणना से पहले जारी सभी एग्जिट पोल्स ने एनडीए की स्पष्ट जीत की भविष्यवाणी की है। इन सर्वेक्षणों में प्रशांत किशोर की पार्टी जनसुराज को महज किनारे का खिलाड़ी दिखाया गया है, जो उनके लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है।

चुनाव प्रचार के दौरान किशोर ने एक राष्ट्रीय चैनल को इंटरव्यू में कहा था कि अगर जेडीयू को 25 सीटें मिल गईं तो वे राजनीति छोड़ देंगे। हालांकि, नेताओं के दावे अक्सर वादों तक ही सीमित रहते हैं, लेकिन यह उनकी छवि को प्रभावित जरूर करेगा। 2022 में स्थापित जनसुराज ने बिहार में "नया सूरज" लाने का वादा किया था और किशोर की पादयात्रा ने लाखों युवाओं को आकर्षित किया। पार्टी ने 243 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन एग्जिट पोल्स ने निराशाजनक परिणाम दिखाए हैं मैट्रिज के अनुसार केवल 5 सीटें, डीवीसी रिसर्च के मुताबिक 2-4 सीटें, और कई सर्वे में शून्य सीटें।

हालांकि किशोर के लिए एक राहत की बात यह है कि पार्टी का वोट शेयर 11-12% अनुमानित है, जो कांग्रेस से बेहतर है। लेकिन इसका कारण यह है कि जनसुराज कम से कम चार गुना ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ रही है। एक्सिस माय इंडिया केवल 4% वोट ही पार्टी को दे रहा है। किशोर, जो पहले मोदी और नीतीश की जीत के सूत्रधार रहे, ने 'सुशासन' का नया मॉडल पेश किया, लेकिन जनता उसे अपनाने को तैयार नहीं दिख रही है।

एग्जिट पोल में निराशा के कई कारण हैं:

1. मोदी-शाह को निशाने पर न लेना: किशोर ने केंद्रीय नेताओं नरेंद्र मोदी और अमित शाह को सीधे चुनौती नहीं दी। इससे संदेश गया कि वे 'सेफ गेम' खेल रहे हैं और जनसुराज एनडीए की बी-टीम जैसी पार्टी प्रतीत हुई।

2. सम्राट और अशोक चौधरी पर आरोपों में असंगति: किशोर ने एनडीए के वरिष्ठ नेताओं पर भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोप लगाए, लेकिन सबूत पेश न करने और फोकस बदलने के कारण यह राजनीति में बूमरैंग साबित हुआ।

3. शराबबंदी का विरोध: किशोर ने शराबबंदी हटाने का वादा किया, जो महिलाओं के बीच असंतोष फैलाने वाला साबित हुआ। बिहार में शराबबंदी सामाजिक न्याय और महिला सुरक्षा का प्रतीक बन चुकी है, और इसका विरोध उनके लिए राजनीतिक आत्मघाती कदम बन गया।

4. तेजस्वी यादव के खिलाफ चुनौती से पीछे हटना: किशोर ने महागठबंधन के युवा नेता तेजस्वी यादव के खिलाफ सीधा मुकाबला न लड़कर अपने आप को वैकल्पिक विकल्प के रूप में स्थापित करने का सुनहरा मौका खो दिया। सितंबर-अक्टूबर 2025 में तेजस्वी पर हमले बोलने के बाद 15 अक्टूबर को किशोर ने चुनाव न लड़ने का ऐलान किया।

सारांश यह है कि प्रशांत किशोर, जिन्होंने पहले कई राज्यों में सरकारें बनाने में भूमिका निभाई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता दिलाने का दावा किया, इस बार अपने दावों पर खरा नहीं उतर पाए। रणनीति, राजनीतिक फोकस और जनता के भावनात्मक जुड़ाव में कमी के कारण जनसुराज अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी।

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Shivam Shrivastava

शिवम उत्तर प्रदेश के एक युवा और उभरते पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग 4 वर्षों का अनुभव प्राप्त है। वे राजनीति, अपराध, स्वास्थ्य और हाइपरलोकल खबरों की गहरी समझ रखते हैं और समसामयिक मुद्दों पर सटीक व प्रभावशाली रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं। उनकी विशेष रुचि डाटा-ड्रिवन पत्रकारिता और विश्लेषणात्मक रिपोर्टिंग में है, जिससे उनकी खबरें अधिक तथ्यात्मक और विश्वसनीय बनती हैं। वे जमीनी स्तर की रिपोर्टिंग के साथ-साथ डिजिटल मीडिया के बदलते स्वरूप को भी समझते हैं। लेखन और रिसर्च में उनकी मजबूत पकड़ उन्हें एक सक्षम और जिम्मेदार पत्रकार के रूप में स्थापित करती है।

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