Acharya Vidyanand: संघर्ष से संल्लेखना तक- आचार्य विद्यानंद की संत यात्रा पर राष्ट्र का सम्मान

Acharya Vidyanand: आइए जानते हैं आचार्य विद्यानंद जी के जीवन, उनके आध्यात्मिक योगदान, जैन समाज में उनके ऐतिहासिक कार्यों और सामाजिक सुधार में उनके योगदानों के बारे में विस्तार से।

Jyotsana Singh
Published on: 30 Jun 2025 10:41 PM IST
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Acharya Vidyanand (Image Credit-Social Media)

Acharya Vidyanand: जिन संतों ने अपने जीवन को समाज, धर्म और मानवता की सेवा में समर्पित कर दिया, उनमें दिगंबर जैन आचार्य विद्यानंद जी महाराज का नाम अत्यंत श्रद्धा और सम्मान से लिया जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 जून 2025 को विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आचार्य श्री के शताब्दी समारोह का उद्घाटन किया। यह आयोजन एक वर्ष तक चलेगा और इसमें कई धार्मिक, सांस्कृतिक व साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

बाल्यकाल और प्रारंभिक जीवन

आचार्य विद्यानंद जी का जन्म 22 अप्रैल 1925 को कर्नाटक के शेडवाल गांव में हुआ था। उनका लौकिक नाम सुरेंद्र उपाध्ये था। उनके पिता का नाम कालप्पाजी और माता का नाम सरस्वती था। सुरेंद्र उपाध्ये की प्रारंभिक शिक्षा दानवड़ में हुई, लेकिन भाषा की समस्या के कारण वे शांतिसागर आश्रम चले गए जहां उन्होंने संस्कृत, प्राकृत और जैन दर्शन की गहराई से शिक्षा ली। जो आगे चलकर उन्हें संभवत: जैन साहित्य का चलता-फिरता कोश बना गई।

देशभक्ति से आध्यात्मिकता की ओर

युवा अवस्था में सुरेंद्र उपाध्ये भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय हुए और देश की आजादी के लिए अपने जीवन को समर्पित किया। इस दौरान उनके जीवन में गहरा परिवर्तन आया और उन्होंने अध्यात्म की ओर रुख किया। उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ जुलूसों और आंदोलनों में भाग लिया।कई बार जेल जाने से भी बाल-बाल बचे।

लेकिन जब वे चातुर्मास में आचार्य महावीर कीर्ति के सान्निध्य में आए, तो उनका जीवन बदल गया। वे कहते थे कि, 'मैंने गुलामी के खिलाफ लड़ाई छोड़, अब आत्मा की मुक्ति की लड़ाई शुरू की है।' वर्ष 1946 में आचार्य महावीर कीर्ति के चातुर्मास के दौरान उन्होंने क्षुल्लक दीक्षा ली और उनका नया नाम पड़ा क्षुल्लक पाश्र्वकीर्ति वर्णी।

इस तरह इनके नाम और पद में हुए बदलाव

वर्ष 1963 में नई दिल्ली में आचार्य देशभूषण से उन्होंने मुनि दीक्षा ली और उनका नाम रखा गया मुनि विद्यानंद। वहीं 8 दिसंबर 1974 को उन्हें उपाध्याय बनाया गया। 17 दिसंबर 1978 को उन्हें ऐलाचार्य का सम्मान प्राप्त हुआ। जिसके उपरांत उन्हें 28 जून 1987 को नई दिल्ली में आचार्य पद से विभूषित किया गया।

विचार और साधना की मिसाल है इनका व्यक्तित्व

आचार्य विद्यानंद जी का जीवन कठोर तपस्या, ब्रह्मचर्य और ध्यान की मिसाल रहा है। उन्होंने संपूर्ण भारत में नंगे पांव पदयात्राएं कीं। उनका 'कायोत्सर्ग ध्यान' का अभ्यास, आचार और चर्या, अन्य संतों के लिए आदर्श बने। वे 95 वर्ष की आयु तक पूर्ण रूप से संयमित जीवन जीते रहे और अंततः संल्लेखना समाधि द्वारा अपने जीवन का शांतिपूर्ण समापन किया।

लेखन और बौद्धिक योगदान

आचार्य श्री विद्यानंद ने जैन धर्म, दर्शन और नैतिकता पर 50 से अधिक ग्रंथों की रचना की। उन्होंने 8,000 से अधिक आगमिक छंदों का कंठस्थ अध्ययन किया था। उनका लेखन प्राकृत, संस्कृत और हिंदी जैसी भाषाओं में हुआ, जो जैन शिक्षा के प्रसार में मील का पत्थर सिद्ध हुआ।

उनके कुछ उल्लेखनीय विषयों में जैन दर्शन की व्याख्या, नैतिक शिक्षा पर ग्रंथ, अणुव्रत आंदोलन के समर्थन में साहित्य, प्राचीन मंदिरों का संरक्षण और जीर्णोद्धार आदि शामिल रहे हैं। आचार्य विद्यानंद जी ने भारत भर के कई जैन मंदिरों का जीर्णोद्धार और संरक्षण किया। उन्होंने मंदिरों को केवल भौतिक संरचनाएं नहीं, बल्कि जीवंत आस्था का केंद्र माना। उनकी देखरेख में प्राचीन तीर्थ स्थलों का पुर्ननिर्माण, मंदिरों की वास्तुशास्त्रीय परंपरा का संरक्षण, तीर्थ यात्राओं के लिए जनजागरण, जैन ध्वज और प्रतीक की ऐतिहासिक प्रस्तुति जैसे सनातनी सामाजिक सरकारों का बीड़ा उठाया। आचार्य विद्यानंद जी को जैन समाज के लिए एक प्रतीकात्मक और ऐतिहासिक योगदान के लिए हमेशा याद किया जाएगा। वर्ष 1975 में भगवान महावीर के 2500वें निर्वाण महोत्सव के अवसर पर, उन्होंने सभी प्रमुख जैन संप्रदायों की सहमति से एक आधिकारिक जैन ध्वज और प्रतीक तैयार किया। इस निर्वाण महोत्सव के दौरान, विभिन्न जैन पंथों में एकता को लेकर मतभेद थे। जैन समाज एक ऐसे प्रतीक की तलाश में था जो सबको एकसूत्र में बांध सके। अंततः आचार्य विद्यानंद ने पांच रंगों वाला जैन ध्वज डिज़ाइन कर प्रस्तावित किया। उन्होंने पंथों के शीर्ष आचार्यों से सहज संवाद कर सर्वसम्मति बनाई, जो तब तक दुर्लभ माना जाता था। उनके कहने पर हथेली में ‘अहिंसा’ का प्रतीक भी जोड़ा गया। इस घटना ने उन्हें एक जैन एकता के सूत्रधार के रूप में स्थापित कर दिया।

हिमालय यात्रा और उत्तर भारत में प्रभाव

वर्ष 1969 में आचार्य श्री ने हिमालय की यात्रा की और श्रीनगर (उत्तराखंड) में चातुर्मास किया। वे बद्रीनाथ पहुंचने वाले पहले दिगंबर जैन संत थे। यह यात्रा उनकी अध्यात्मिकता, साहस और तपश्चर्या का प्रतीक थी। इंदौर, मेरठ, महावीरजी जैसे अनेक स्थलों पर उन्होंने चातुर्मास किए और धर्मप्रचार किया।

आचार्य विद्यानंद जी ने चातुर्मास को केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जनजागरण का माध्यम बनाया। श्रीनगर में चातुर्मास करते समय उन्होंने ध्यान, व्याख्यान और नैतिकता शिविर शुरू किए।

इंदौर में उन्होंने रात्रि प्रवचनों में नशा मुक्ति और अणुव्रत आंदोलन को समर्थन दिया, जिससे हजारों युवाओं ने व्यसन त्यागने का संकल्प लिया।

सामाजिक जागरूकता और शिक्षा के क्षेत्र में कार्य

उन्होंने धार्मिक शिक्षा को ही नहीं, बल्कि नैतिक एवं मानवीय मूल्यों को भी समाज में स्थापित करने के लिए सतत प्रयास किए।

उनके द्वारा संचालित संस्थानों ने युवाओं को प्राकृत और दर्शन की शिक्षा दी। स्त्रियों और समाज के पिछड़े वर्गों में शिक्षा का प्रचार किया। पर्यावरण और शाकाहार पर जागरूकता अभियान चलाए।

समाज में समरसता का संदेश फैलाया।

आचार्य विद्यानंद जी केवल एक दिगंबर संत नहीं थे, बल्कि वे समाज में समरसता, शांति और करुणा के वाहक थे। उन्होंने विभिन्न धर्मों के संतों से संवाद किए, अनेक राष्ट्रीय आयोजनों में हिस्सा लिया और सद्भाव का संदेश दिया। उन्होंने कभी राजनीतिक मंचों से दूरी नहीं बनाई, लेकिन धर्म को राजनीति से अलग रखते हुए संयम और विवेक का उदाहरण प्रस्तुत किया।

नई दिल्ली में रहते हुए कई बार राजनीतिक नेताओं ने उन्हें मंच पर आमंत्रित किया।

उन्होंने कभी भी राजनीतिक दलों की तरफ झुकाव नहीं दिखाया, लेकिन जब भी बात धर्म, पर्यावरण, शिक्षा और सेवा की आई, उन्होंने सार्थक हस्तक्षेप किया।

एक बार उन्होंने इस विषय पर अपने संबोधन में कहा था कि, 'राजनीति अगर रोटी है, तो धर्म नमक बिना संतुलन के दोनों नुकसान करेंगे।'

जब उन्होंने 8,000 आगमिक छंद मौखिक रूप से सुनाए

एक बार राजस्थान के सुजानगढ़ में हुए जैन साहित्य सम्मेलन में एक विद्वान ने सवाल उठाया कि कोई व्यक्ति इतने ग्रंथ कैसे कंठस्थ रख सकता है?

आचार्य विद्यानंद जी ने मंच पर ही लगातार 6 घंटे तक 1,000 से अधिक प्राचीन छंद बिना किसी ग्रंथ के उद्धृत कर सुनाए। यह देख वहां उपस्थित हजारों श्रोता स्तब्ध रह गए। उनकी इस स्मरण शक्ति को देखकर विद्वान बोले कि हमने सिर्फ पुस्तकों से पढ़ा पर इन्होंने आत्मा से जिया।'

संल्लेखना और समाधि - एक सिद्ध संत का अंत

आचार्य श्री ने 95 वर्ष की उम्र में संल्लेखना के माध्यम से समाधि ग्रहण की। यह उनकी साधना, संयम और पूर्ण त्याग का अंतिम बिंदु था, जिसे उन्होंने जैन परंपराओं के अनुसार निभाया।

अंतिम क्षणों के दौरान जब उनसे पूछा गया –

आपको मृत्यु से डर नहीं लगता?

उन्होंने मुस्कुराकर कहा – 'जिनेंद्र प्रभु की भक्ति और आत्मा की शुद्धि में डर कैसा?' उनका चेहरा समाधि से पहले भी शांत और प्रफुल्लित था।

आचार्य विद्यानंद जी का जीवन एक तपस्वी का था, लेकिन उसमें आधुनिक चेतना और सामाजिक दृष्टि की झलक भी थी। वे जैन परंपरा के प्रतीक तो थे ही, साथ ही समकालीन भारत के लिए एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक, सामाजिक सुधारक और सांस्कृतिक सेतु भी थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उनके शताब्दी समारोह का उद्घाटन इस बात का प्रतीक है कि भारत आज भी उन संतों को स्मरण करता है जिन्होंने धर्म को केवल पूजा तक सीमित नहीं किया, बल्कि उसे जीवन का मार्गदर्शन बनाया। आज जब भारत सांस्कृतिक पुनर्जागरण के दौर से गुजर रहा है, तब आचार्य विद्यानंद जैसे संतों का जीवन हमें याद दिलाता है कि संयम, सेवा और सद्भाव ही सही मार्ग है।

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Jyotsana Singh is an Tech/Auto and Tourism Desk Content Writer at Newstrack.com.

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