TRENDING TAGS :
शुगर फ्री की तरह बी टीम फ्री हुए औवेसी, मात्र दस हजार में नीतीश बनेंगे दसवीं बार सीएम !
एनडीए की ऐतिहासिक जीत, महागठबंधन की रणनीतिक चूक, मुस्लिम वोटों का बिखराव और ओवैसी पर ‘बी टीम’ वाले आरोपों से मिली राहत ने बिहार की राजनीति में नए समीकरण बना दिए
Owaisi (Photo_ Social Media)
यूपी के दो लड़कों की हार के लम्बे समय बाद बिहार में दो लड़कों की जोड़ी को दो गुजरातियों ने किया सुपर फ्लॉप बात कुछ अजीब लगती जरूर है पर सच यही है। जीत-हार के बहुत से कारण होते हैं, पर लड़ने वालों को बाद में ही पता चलता है कि कौन सा शस्त्र विजय दिलाने में कारगर रहा और हमारे किस शस्त्र ने हमें ही पराजित करवा दिया। लेकिन फिलहाल बिहार हार के बाद विपक्षी हार के कारणों पर विचार करने के बजाय यही मान रहे हैं कि वोट चोरी ने उन्हें नहीं जीतने दिया।
बिहार में महागठबंधन (कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल) की करारी हार और भाजपा सहित संपूर्ण एनडीए की बंपर जीत को समझना मुश्किल नहीं है। भाजपा-जनता दल यूनाइटेड सत्तारूढ़ थी,इनकी डबल इंजन की सरकार थी, इनके पास दो-दो सरकारी खजाने हैं। महिलाओं के खाते में दस-दस हजार रुपए डालने का तीर चला तो लालटेन बुझ गई और हाथ घायल हो गया। महागठबंधन के पास इसकी कोई काट नहीं थी। तेजस्वी यादव ने घर-घर सरकारी नौकरियों का वादा जरुर किया पर दस हजार देने की हकीकत और नौकरी देने के वादे में अंतर है। मात्र दस हजार में नीतीश कुमार का दसवीं बार मुख्यमंत्री बनना तय हो गया। चुनावी रेवड़ियां पर एतराज़ किया जाता रहा है पर ऐन चुनाव से पहले महिलाओं को दस हजार के प्रलोभन का आरोप महागठबंधन पर भारी पड़ सकता था इसलिए इसकी काट में सरकारी नौकरी का प्रलोभन देना ही तेजस्वी ने मुनासिब समझा।
ये तो सत्तारूढ़ एनडीए की कुशल रणनीति थी जिसकी काट विपक्ष के पास नहीं थी, लेकिन राजद और कांग्रेस ने कुछ गलतियां ऐसी कर दीं जिससे तेजस्वी यादव और राहुल गांधी की मेहनत पर पानी फिर गया और ये जोड़ी सुपर फ्लॉप हो गई। कहा जा रहा है कि बहुत पहले यूपी में दो लड़कों (राहुल गांधी और अखिलेश यादव) की जोड़ी बुरी तरह हारी थी,इसके बाद बिहार में दो लड़कों ( राहुल और तेजस्वी यादव) की जोड़ी को भी दो बिहारियों (प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह) ने सुपर फ्लाप साबित कर दिया।
विपक्ष के धर्मनिरपेक्ष दलों की हार के बाद कुछ कॉमन जुमले विपक्षियों के बयान और सोशल मीडिया पर तैरते हैं। जिसमें एआईएमआईएम चीफ असद्दुदीन ओवैसी पर भाजपा की बी टीम की तोहमत भी शामिल हैं। बिहार में महागठबंधन की करारी हार और बीजेपी की बड़ी जीत के बाद पहला ऐसा मौका है जब ओवैसी पर भाजपा की बी टीम की तोहमतें नहीं लग रही हैं। और ना उनके सिर पर हार का ठीकरा फोड़ा जा रहा है।
बिहार में पांच सीटें जीतने के बाद औवेसी को शुगर-फ्री की तर्ज पर भाजपा बीटीम फ्री करने के कारण हैं। अपने जन्म से ही बी टीम का इल्ज़ाम सह रहे एआईएमआईएम ने इस आरोप से मुक्ति पाने की सुनियोजित रणनीति तैयार की थी। बिहार चुनाव में दो शक्तिशाली गठबंधन अलग-अलग जातियों को हिस्सेदारी देने के लिए अपने-अपने गठबंधनों को स्वरूप दे रहे थे। औवेसी की पार्टी पिछले विधानसभा चुनाव में पांच सीटें जीती थीं और इस बार उसने बड़ी शिद्दत से कोशिश की कि महागठबंधन में उसे एंट्री मिल जाए। और पांच सीट जीत चुकी पार्टी ने केवल छह सीटें मांगी। तेजस्वी यादव को ख़त भेज कर औवेसी ने मात्र छह सीटों का प्रस्ताव रखा था। जवाब नहीं मिला तो एआईएमआईएम ने उनके दरवाजे पर ढोल-ताशे बजाकर बी टीम का आरोप लगाने वालों को संदेश देने के लिए कहा कि हम नहीं चाहते कि हमारी वजह से विपक्ष हारे और भाजपा जीते। हम वोट कटवा नहीं बनना चाहते। हम बी टीम के झूठे आरोपों से बरी होना चाहते हैं। महागठबंधन विभिन्न जातियों की हिस्सेदारी के हिसाब से उन्हें ज्यादा सीटें दे रहा हैं जिनका वोट और जनाधार भी काफी कम है, पर हम पांच सीटें जीते थे और मुस्लिम बाहुल्य विधानसभा क्षेत्रों से केवल छह सीटें ही मांग रहे हैं। संदेशवाहक आग्रह करने के बाद भी तेजस्वी ने औवेसी को अछूत मानकर उनका आग्रह नहीं माना। सीट देना और महागठबंधन में प्रवेश देना तो दूर तेजस्वी ने ओवैसी के बारे में सख्त शब्दों का प्रयोग किया। कांग्रेस ने भी ओवैसी की जायज मांग और दर्द को महसूस नहीं किया।
अंततोगत्वा मुस्लिम समाज महागठबंधन से नाराज़ हुआ, ओवैसी का साथ दिया और कई सीटों पर मुस्लिम वोटों का बिखराव भी खूब हुआ। यही वजह है कि भाजपा की जीत और धर्मनिरपेक्ष दलों की हार पर पहली बार इस हार का जिम्मेदार ओवैसी को नहीं माना जा रहा है। बी टीम के तंज़ नहीं कसे जा रहे हैं। एआईएमआईएम की पांच सीटों की जीत से मुस्लिम समाज के आंसू पुछ गए हैं। बल्कि मुसलमानों का एक वर्ग खुश हैं और बीजेपी वाले भी ओवैसी की जीत से नाखुश नहीं दिख रहे। शूगर फ्री मिठाई की तरह ओवैसी भाजपा की बीटीम के अल्जाम से फ्री दिख रहे हैं।
एआईएमआईएम ने यूपी के 2027 के आगामी चुनावों में अधिक से अधिक सीटों पर चंद्रशेखर आजाद और स्वामी प्रसाद मौर्य के छोटे दलों के साथ मिल कर चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव का बिहार के चुनावी नतीजों से पैदा हुए यूपी के मुस्लिम रुख से दबाव में आना स्वाभाविक है। ताज्जुब नहीं कि अखिलेश को आगे ए आई एम आई एम के साथ समझौता करने पर विचार करने पड़े। नहीं तो ऐसा भी संभव है कि बसपा के साथ ए आई एम आई एम यूपी में मुस्लिम - दलित फार्मूले पर कोई निर्णय ले ले। ये बात तो दिख रही है कि बिहार में जिस तरह एम आई (यादव-मुस्लिम ) समीकरण बिखरा और राजद को करारी पराजय मिली ऐसा खतरा यूपी में सपा को दिखने लगा है। बिहार में यादव भी बंटा है और एनडीए के यादव उम्मीदवार भी जीते हैं।
हांलांकि भाजपा विरोधी धर्मनिरपेक्ष दल एस आई आर, वोट चोरी, चुनाव आयोग की धांधली के आरोपों के मुद्दों पर अड़े है। खबर है कि चुनावी परिणाम स्वीकार करने से इंकार करते हुए राजद के सभी विधायक सदस्यता से इस्तीफा देंगे।
इस बात पर भी गौर करना होगा कि विपक्ष के आरोपों के हिसाब से यदि दस वर्षों से करोड़ों नागरिकों की वोट चोरी हो रही है तो जनता अब तक इसके विरोध में सड़क पर क्यों नहीं आई ?
जिस जनता की सबसे बड़ी ताकत मताधिकार चोरी करने की आप बात कर रहे हैं वो जनता कहां है ?
ये भारत है, यहां मुर्गी चोरी हो जाए तो मुर्गी मालिक आफत मचा देता है। लोगों के घरों में घुस मुर्गी ढूंढता है।
बिजली चली जाए तो लोग सड़कों पर उतर आते हैं। पब्लिक रास्ता जाम कर देती है।
चोर पर लपक कर भीड़ चोर को बांध कर मारती है।
लखनऊ का एक हालिया सच्चा वाकिया है। बाइक से पेट्रोल चोर चुराने वाले को रंगे हाथ पकड़ने के लिए पूरे अपार्टमेंट ने मिलकर रणनीति बनाई। बड़ी मशक्कत के बाद रंगे हाथ पकड़ने में कामयाबी हासिल हुई और तेल चोर को पकड़कर लोगों ने उसका तेल निकाल दिया।
आप कह रहे हैं कि करोड़ों वोटरों का वोट चोरी होने का दस वर्षों से सिलसिला जारी है।
ताज्जुब है कि दस लोग भी वोट चोरी के विरोध में सड़कों पर नहीं उतरे ?
सोशल मीडिया पर इस तरह के सवाल भाजपा विरोधी और धर्मनिरपेक्ष दलों के समर्थक भी उठा रहे हैं।
बिहार हार से भाजपा विरोधी हलकों में मची हलचल में कांग्रेस को भी खूब घेरा जा रहा है। तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री का चेहरा पेश करने में राहुल गांधी ने बहुत देर की जिसके कारण राजद का वोट कांग्रेस में शिफ्ट नहीं हो सका। राहुल जमीनी संघर्ष में पीछे नहीं पर दिखे पर विपक्षी दलों के साथ तालमेल में कमजोर साबित हो होते रहे। कहा ये भी जा रहा है कि कांग्रेस के अतिआत्मविश्वास, हीलाहवाली, कमजोर कॉरडीनेशन और क्षेत्रीय दलों को नजरंदाज करने से भाजपा की सफलता का कारवां बढ़ता जा रहा है। पिछले लोकसभा चुनाव से पहले जब देशभर के विपक्षी दलों ने शक्तिशाली भाजपा/एनडीए को हराने के लिए एकजुट होकर इंडिया गठबंधन बनाया था तब नीतीश कुमार ने ही इस कल्पना को जन्म दिया था। इंडिया गठबंधन से भाजपा घबराई हुई नजर आई थीं, किंतु कांग्रेस ने क्षेत्रीय दलों के साथ सामंजस्य बनाने में बहुत लापरवाही की। नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड लगातार कह रही थी कि कांग्रेस ढीली पड़ी है, इंडिया गठबंधन की अगवाई करने वाली कांग्रेस के शीर्ष नेता क्षेत्रीय दलों से बात तक नहीं कर रहे। कोई भी संयोजक नहीं बनाया गया। कहां जाता है कि नीतीश कुमार इंडिया गठबंधन के संयोजक बनना चाहते थे पर कांग्रेस ने ऐसा नहीं होने दिया। नतीजतन नीतीश कुमार ने कांग्रेस की अनदेखी से दुखी होकर अपने चिर-परिचित अंदाज में पलटी मारी और वो इंडिया छोड़कर एनडीए में शामिल हो गए।
और वही नीतीश जो देश के सभी भाजपा विरोधी दलों की एकजुटता से भाजपा को परास्त करने की कुशल रणनीति के रथ के सार्थी थे मजबूरन उन्हें अपना अस्तित्व बचाने के लिए भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए की सफलता का मील का पत्थर होने पड़ा। नीतीश की दूरदर्शिता सही साबित हुई।


