अकलियत : धर्मनिरपेक्ष दल पत्नी, औवेसी गर्लफ्रेंड

धर्मनिरपेक्ष दलों से नाराज़ अकलियत का झुकाव औवेसी की ओर बढ़ रहा है। बिहार जैसे संकेतों से सपा-कांग्रेस की चिंता बढ़ी, वोट बिखराव बड़ा मुद्दा।

Naved Shikoh
Published on: 20 Nov 2025 3:55 PM IST
Owaisi Muslim Leadership
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Owaisi Muslim Leadership (Photo_ Social Media)

मुस्लिम समाज और धर्मनिरपेक्ष दलों का पति-पत्नी जैसा प्यार और विश्वास का रिश्ता रहा है। किंतु इधर ये दल राजनीतिक हवा की मजबूरी में अल्पसंख्यकों को अपना फिक्स वोट मानकर इन्हें नजरअंदाज करने लगे और दलितों व बहुसंख्यक समाज को रिझाने की ज्यादा कोशिश करने लगे हैं। इस बात से नाखुश अकलियत एआईएमआईएम के असद्दुदीन औवेसी को गर्लफ्रेंड की तरह ट्रीट कर रही है। ताकि उसके विश्वास के पारंपरिक दल पत्नी की तरह डरें,घबराएं व अपने प्यार और विश्वास पर पुनः तवज्जो दें। ऐसे अल्टीमेटम के बाद भी उन्हें धर्मनिरपेक्ष दलों ने नजरअंदाज करना जारी रखा तो अकलियत बीवी (धर्मनिरपेक्ष दल) को तलाक देकर गर्लफ्रेंड से निकाल कर लेंगे ।

बिहार के पिछली दो विधानसभा चुनावों में ऐसा ही हुआ। कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल को नजरंदाज कर मुसलमानों ने औवेसी की झोली में पांच सीटें डाल दीं, अन्य कई सीटों पर महागठबंधन और एआईएमआईएम में अकलियत के वोटों का बंटवारा हुआ और एनडीए को इसका सीधा लाभ मिला।

दरअसल बिहार में महागठबंधन की हार के तमाम कारणों में मुस्लिम समाज की नाराजगी और इनके वोटों का बिखराव भी था। औवेसी महागठबंधन में आधा चाहते थे और उन्होंने साफ कहा था कि उनकी पार्टी वोट कटवा या भाजपा की बी टीम के इल्ज़ाम से बरी होना चाहती है। इसलिए ए आई एम आई एम गठबंधन के शीर्ष नेताओं के दरवाजे पर जाकर केवल छह सीटों की गुजारिश की थी। जबकि बिहार में पिछले चुनाव में ए आई एम आई एम पांच सीट जीती थी।

ओवैसी की इतनी गुजारिश और सफाई देने के बाद भी तेजस्वी यादव ने उन्हें एक भी सीट नहीं दी और कड़वे शब्द इस्तेमाल किए, ये बात मुस्लिम समाज को नागवार गुजरी।

मसला ये है कि मुसलमान चाहता है कि उनका समाज एकजुट होकर धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए जिन दलों का समर्थन करता रहा है वो दल खुल कर मुस्लिम समाज के मुद्दों को उठाएं। टिकट, संगठन, सियासत और हुकुमत में पर्याप्त हिस्सेदारी मिले। लेकिन मुसलमानों के वोट लेने वाले दल भाजपा द्वारा लगाए गए तुष्टिकरण के आरोपों और ध्रुवीकरण के प्रयासों के हथियार कुंद करने के लिए मुसलमान शब्द से भी बचने लगी है। सियासी मजबूरी इसक़द्र हावी हो गई है कि समाजवादी पार्टी के पीडीए में मुस्लिम के बजाए अल्पसंख्यक शब्द का इस्तेमाल किया गया है।

देश की आजादी और लोकतांत्रिक व्यवस्था के बाद से अधिकांश काल खंडों में मुस्लिम समाज धर्मनिरपेक्ष दलों के समर्थन में आगे रहा है। समय-समय पर सपा और कांग्रेस जैसे दलों की तरफ अकलियत का झुकाव बढ़ा। मुस्लिम समाज इन दलों का सबसे बड़ा वोट बैंक बन गया।

पिछले करीब दस-ग्यारह बरस से भाजपा ने ये माहौल जमा दिया कि सपा-कांग्रेस जैसे दल मुस्लिम तुष्टिकरण में अव्वल है। इनकी सत्ता में हिन्दुओं को नजरंदाज किया जाता है। उनकी सरकारों में सनातनी सुरक्षित नहीं रहते। भाजपा द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बयान को अपने तरीके से पेश किया जाता है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में देश के संसाधनों का पहला हक़ मुसलमानों को देने की बात कही जाती थी। और प्रयोगात्मक तरीके से भी यही होता रहा। कांग्रेस सरकार में हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी गढ़ कर सनातनी समाज पर आतंकवादी होने के दाग़ लगाने की साजिशें हुईं। उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार में जेहादी आतंकवादियों पर से मुकदमे वापस लिए गए।

ऐसे आरोपों का परसेप्शन बहुसंख्यक वर्ग को चिपका तो भाजपा के आंगन में सत्ता की बहार आ गई। अस्सी-बीस के खेल में ध्रुवीकरण भाजपा को खूब रास आया। तुष्टिकरण जैसे सबसे अधिक आरोप सह रही अखिलेश यादव की नई सपा ने मुस्लिम मामलात और मुद्दों से थोड़ी दूरी बना ली। यदि दो घटनाओं में कहीं दलित के साथ अन्याय हुआ और कहीं मुसलमान के साथ तो अखिलेश यादव ने दलित अन्याय मुद्दे को तो खूब उठाया पर मुस्लिम मामले में वो अधिक मुखर नहीं हुए। अखिलेश यादव की ऐसी राजनीतिक मजबूरी को समझते हुए बिहार में राजद मुखिया तेजस्वी यादव ने भी कुछ ऐसा ही किया। दो राज्यों में नजर अंदाज किए जा रहे अल्पसंख्यक वर्ग ने झटका देते हुए एआईएमआईएम में दिलचस्पी दिखाई। ये झटका बिहार में महागठबंधन को करारी हार की तरफ ले गया। ये तस्वीर अब सपा मुखिया अखिलेश यादव को सताने लगी है। वैसे ही जैसे पत्नी अपने पति का ख्याल ना रखने की सजा में उसे गर्लफ्रेंड के साथ देखले तो उसे अपनी ग़लती का अहसास होने लगता है। कुछ पत्नियां ऐसी जटिल स्थिति में अपना घर बचाने के लिए पति को खूब प्यार देने लगती हैं, सेवा सत्कार और ख्याल रखने में जुट जाती हैं।

एक सर्वे है-पत्नी का प्यार,ख्याल, सेवा सत्कार पर्याप्त हो तो पति इधर-उधर नहीं भटकता। ऐसे शादीशुदा पुरुषों की गर्लफ्रेंड होती है जिनकी पत्नी पतिव्रता नहीं होती। पत्नी ने अपने प्यार में नहीं बांध रखा,अनदेखा किया तो पति प्यार की तलाश में भटकने लगता है। ऐसा सर्वे या ऐसी धारणाएं सही हो या बिल्कुल ग़लत हों वो अलग विषय है लेकिन धर्मनिरपेक्ष दलों के अटूट विश्वास के खूंटे से बंधा मुस्लिम समाज कभी कभी खूंटा तोड़कर क्यों भागने का प्रयास करता है। खूंटे के दायरे में जब पर्याप्त भोजन-पानी और देखरेख नहीं मिलती तो वो खूंटा छुड़ाकर हरी घास के आकर्षण की तरह भागता है।

अकलियत का ये रुख देखकर यूपी विधानसभा चुनाव 2027 के मद्देनजर अखिलेश यादव कशमकश में हैं। मुस्लिम समाज के ज्यादा करीब जाएं तो तुष्टिकरण के आरोपों के रंग गहरे दिखेंगे, दूरी बना कर रखी तो अकलियत ओवैसी या बसपा के साथ जा सकते हैं। औवेसी को गठबंधन में शामिल कर लिया तो सपा पर मुस्लिम परस्ती का नया टैग लगाने में भाजपा नहीं चूकेगी।

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