Baghpat News: बागपत में 4500 वर्ष पुराना ओसीपी कल्चर का दुर्लभ कुआं मिला, पुरातत्व जगत में हलचल

Baghpat News: बागपत के तिलवाड़ा गांव में मिला ओसीपी काल का प्राचीन कुआँ, विशेषज्ञ बोले- यह खोज कांस्य युगीन सभ्यता और जल प्रबंधन का दुर्लभ साक्ष्य है।

Paras Jain
Published on: 9 Nov 2025 10:29 PM IST
Rare well of 4,500-year-old OCP culture found in Baghpat
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बागपत में 4500 वर्ष पुराना ओसीपी कल्चर का दुर्लभ कुआं मिला, पुरातत्व जगत में हलचल (Photo- Newstrack)

Baghpat News: देश की राजधानी दिल्ली से महज 40 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश का बागपत जिला एक बार फिर इतिहास और पुरातत्व की सुर्खियों में है। छपरौली क्षेत्र के तिलवाड़ा गांव में एक खेत से मिले प्राचीन पुरावशेषों ने न केवल स्थानीय लोगों में उत्सुकता जगाई है, बल्कि इसे भारतीय उपमहाद्वीप की कांस्य युगीन संस्कृति यानी ओसीपी (ओकर्ड कलर्ड पॉटरी) कल्चर का सजीव साक्ष्य बताते हुए इतिहासकारों ने इसे अत्यंत महत्वपूर्ण खोज माना है।

सूत्रों के अनुसार तिलवाड़ा गांव के किसान दुरजा के खेत में मिट्टी समतलीकरण के दौरान बड़ी आकार की ईंटें और प्राचीन मृदभांड (मिट्टी के पात्र) मिले है । संरचना को गहराई से देखने पर यह सामान्य दीवार नहीं बल्कि एक सुविकसित प्राचीन कुआँ प्रतीत हुआ। रविवार को शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक और इतिहासकार डॉ. अमित राय जैन ने स्थल का प्रारंभिक सर्वेक्षण किया। उनके अनुसार यह कुआँ करीब 4500 वर्ष पुराना है और ओसीपी संस्कृति का दुर्लभ व अत्यंत महत्त्वपूर्ण अवशेष है।


डॉ. जैन ने बताया कि अब तक बागपत जिले में इस संस्कृति के चिह्न तो मिले थे, परंतु ओसीपी काल का कुआँ पहली बार मिला है, जो यहाँ के प्राचीन मानव बसावट, जल प्रबंधन और सामाजिक संरचना का प्रमाण देता है। इससे पूर्व जिले के बामनौली क्षेत्र से कुषाण काल (लगभग 1800 से 2000 वर्ष पुराना) का कुआँ मिला था, परंतु तिलवाड़ा का यह कुआँ उससे दोगुना प्राचीन माना जा रहा है। यह खोज यह भी संकेत देती है कि यह क्षेत्र एक समय उन्नत कृषि और जल संरचना के विकास में अग्रणी रहा होगा।

सर्वेक्षण के दौरान प्राप्त गेरुआ रंग के छिद्रयुक्त बर्तन, काले पैटर्न वाली मिट्टी की हाँडियाँ और सामान्य ईंटों से कहीं बड़ी आकार की पकी ईंटों ने यहाँ की सभ्यता की विशिष्टताओं को उजागर किया है। ओसीपी संस्कृति अक्सर उत्तर हड़प्पा और प्रारंभिक वैदिक काल के बीच का सांस्कृतिक पुल कहलाई जाती है, ऐसे में यह कुआँ, मानव निवास, धार्मिक जीवन और स्थानीय समुदाय की संरचना को समझने में नई दिशा देगा।


इतिहासकारों का मानना है कि तिलवाड़ा क्षेत्र केवल एक गाँव भर न होकर संभवतः एक प्राचीन बसावट या ग्राम-नगरीय केंद्र रहा होगा, जहाँ सामाजिक रूप से संगठित जीवन, कृषि आधारित अर्थव्यवस्था और कारीगरी का विकास मौजूद था। यदि उत्खनन आगे बढ़ा, तो यहाँ मानवाकृत मूर्तियाँ, तांबे के उपकरण, अनाज भंडारण के अवशेष और आवासीय संरचनाएँ मिलने की प्रबल संभावना जताई जा रही है। यह खोज पश्चिमी उत्तर प्रदेश को भारतीय सभ्यताओं के मानचित्र पर और अधिक स्पष्टता तथा नई पहचान दिला सकती है।


खेत से लगातार मिट्टी उठान से इस धरोहर को नुकसान पहुँचने की आशंका बनी हुई थी। हालांकि किसान ने पुरातत्व विभाग के निर्देश पर खेत की जुताई व मिट्टी हटाने का कार्य रोक दिया है। डॉ. अमित राय जैन ने बताया कि स्थल की विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जा रही है, जिसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के महानिदेशक डॉ. युद्धवीर सिंह को सौंपा जाएगा। इसके पश्चात यहाँ वैज्ञानिक उत्खनन के लिए औपचारिक अनुरोध किया जाएगा ताकि दबी सभ्यता को संरक्षित व अध्ययन किया जा सके। यह खोज न केवल बागपत बल्कि पूरे उत्तर भारत की सांस्कृतिक जड़ों को समझने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण अध्याय जोड़ सकती है।

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