Chandauli News: पिछड़े वनांचल में शिक्षा की लौः अभिभावकों का संकल्प

Chandauli News: ग्राम्या संस्थान द्वारा संचालित कोचिंग सेंटर, सिर्फ एक शिक्षण केंद्र नहीं बल्कि गांव के बच्चों के भविष्य को संवारने का एक साझा सपना बन गया है।

Sunil Kumar
Published on: 21 Aug 2025 2:51 PM IST
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Chandauli News: चंदौली के सुदूर वनांचल में बसा नौगढ़, एक ऐसा इलाका जहां सुविधाओं का अभाव जीवन की कड़वी सच्चाई है। लेकिन इसी अभाव और पिछड़ेपन के बीच, लालतापुर गांव में शिक्षा की एक छोटी सी लौ जलाकर रोशन करने का प्रयास किया जा रहा है। यहां ग्राम्या संस्थान द्वारा संचालित कोचिंग सेंटर, सिर्फ एक शिक्षण केंद्र नहीं बल्कि गांव के बच्चों के भविष्य को संवारने का एक साझा सपना बन गया है। हाल ही में इस सपने को और मजबूती देने के लिए अभिभावकों की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें सिर्फ बच्चों की प्रगति पर बात नहीं हुई, बल्कि उनके संपूर्ण विकास की एक ठोस रणनीति पर मंथन हुआ।

शिक्षा ही नहीं, कौशल भी जरूरी

बैठक का एजेंडा सिर्फ किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं था। बच्चों के होमवर्क और नियमित पढ़ाई पर जोर देने के साथ-साथ, इस बात पर विशेष ध्यान दिया गया कि उनका सर्वांगीण विकास कैसे सुनिश्चित हो। संस्थान ने इस बात को पुरजोर तरीके से उठाया कि बच्चों को सिर्फ परीक्षा के लिए तैयार करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनमें भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए जरूरी कौशल भी विकसित करने होंगे। इसी उद्देश्य से रचनात्मक गतिविधियों और व्यावहारिक ज्ञान को पाठ्यक्रम में शामिल करने पर चर्चा की गई, ताकि उनमें प्रतिस्पर्धा की भावना जागृत हो और वे जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ सकें।

अभिभावकों का सहयोग, सफलता की कुंजी

यह बैठक इस बात का भी प्रमाण है कि शिक्षा को लेकर गांव के लोग कितने गंभीर हैं। अभिभावकों को यह समझाया गया कि उनकी भागीदारी के बिना कोचिंग का उद्देश्य अधूरा रहेगा। उन्हें घर पर बच्चों के गृहकार्य पर ध्यान देने, सुबह-शाम पढ़ाई के लिए माहौल बनाने और उनके मानसिक और शारीरिक विकास के प्रति सजग रहने का आग्रह किया गया। यह सिर्फ एक औपचारिक बैठक नहीं थी, बल्कि एक सामूहिक जिम्मेदारी का एहसास था। इस बैठक में मौजूद दर्जनों लोगों ने यह साबित कर दिया कि जब समुदाय एकजुट हो जाता है, तो बड़े से बड़े अभाव को भी शिक्षा की ताकत से हराया जा सकता है। यह पहल दिखाती है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो पिछड़े इलाकों में भी उम्मीद की किरण जगाई जा सकती है।

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