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बाप रे बाप... भारत के पड़ोसी देश में टूट पड़ा 'बर्फ का पहाड़', 5630 मीटर ऊंची चोटी पर भयंकर तबाही
नेपाल के यालुंग री पर्वत पर भयानक हिमस्खलन से सात पर्वतारोहियों की मौत हो गई। 5630 मीटर ऊंची इस चोटी पर बर्फ का पहाड़ टूट पड़ा, जिससे पूरा बेस कैंप तबाह हो गया।
Nepal snow tragedy: नेपाल के उत्तर-पूर्व में बर्फ से ढके पहाड़ों के बीच सोमवार को एक दिल दहला देने वाली घटना घटी। यालुंग री की ऊंची चोटी, जो आमतौर पर रोमांच और साहस की मिसाल मानी जाती है, उस दिन मौत की घाटी बन गई। यहां अचानक बर्फ का पहाड़ टूट पड़ा, जिसके बाद कुछ ही मिनटों में सपनों से भरा अभियान खामोश हो गया।
मौत का पहाड़
नेपाल के डोलखा जिले में स्थित यालुंग री पर्वत की ऊंचाई लगभग 5,630 मीटर है। सोमवार सुबह करीब 9 बजे यहां एक जबरदस्त हिमस्खलन (Avalanche) हुआ। 15 लोगों की ट्रैकिंग टीम, जो बेस कैंप की ओर बढ़ रही थी, अचानक बर्फ की उस विनाशकारी लहर में फंस गई। देखते ही देखते सफेद बर्फ ने इंसानी आवाजों को दबा दिया। हादसे में 7 लोगों की मौत हो गई, जिनमें 3 अमेरिकी, 1 कनाडाई, 1 इतालवी और 2 नेपाली नागरिक शामिल हैं। 4 लोग घायल हैं, जबकि 4 अब भी लापता बताए जा रहे हैं।
देर से पहुंची मदद, बढ़ा दर्द
स्थानीय वार्ड अध्यक्ष निंगगेली शेरपा ने बताया कि सुबह से ही बचाव दल को सूचना दी गई थी, लेकिन हेलिकॉप्टर को उड़ान की अनुमति मिलने में देर हुई। रोलवालिंग घाटी को प्रतिबंधित इलाका घोषित किया गया है, जिसकी वजह से रेस्क्यू टीम को मौके तक पहुंचने में काफी समय लग गया। नेपाल आर्मी, पुलिस और आर्म्ड फोर्स के जवानों ने सर्च ऑपरेशन शुरू किया। लेकिन खराब मौसम के कारण हेलिकॉप्टर बेस कैंप तक नहीं पहुंच सका। बाद में जब मौसम थोड़ा साफ हुआ, तब जाकर घायल लोगों को निकाला गया।
रोमांच की जगह बनी खतरे की घाटी
यालुंग री नेपाल-चीन सीमा के पास स्थित एक बेहद खूबसूरत लेकिन खतरनाक पर्वत श्रृंखला है। यहां ट्रैकिंग करने के लिए विदेशी पर्वतारोहियों को स्पेशल परमिट लेना पड़ता है। यह इलाका एवलॉन्च-प्रोन जोन यानी हिमस्खलन संभावित क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। 2019 में भी यहां फ्रेंच पर्वतारोहियों की एक टीम फंस गई थी और कई की जान चली गई थी। वहीं 2015 के भूकंप के बाद इस रूट को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया था।
बर्फ की तबाही हिमस्खलन क्या है?
हिमस्खलन यानी किसी पहाड़ से बर्फ का बड़े वेग से नीचे गिरना। यह तब होता है जब पहाड़ पर जमा बर्फ ढलान के दबाव को झेल नहीं पाती। कई बार यह प्राकृतिक कारणों से होता है भारी हिमपात, भूकंप, या सूरज की गर्मी से बर्फ पिघलने के कारण। जबकि कई बार मानव गतिविधियों जैसे स्कीइंग या स्नो मोबाइल चलाने से भी यह खतरा बढ़ता है।
एक विकसित हिमस्खलन का वजन 10 लाख टन तक हो सकता है और यह 320 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से नीचे गिरता है। ऐसी रफ्तार में जो कुछ भी सामने होता है, वह मलबे में दब जाता है इंसान, तंबू, उपकरण, सब कुछ।


