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Dharmendra Death News: धर्मेन्द्र का जाना, एक युग का ही चले जाना
Dharmendra Death News: बॉलीवुड के ही-मैन धर्मेन्द्र का निधन भारतीय सिनेमा के एक युग के अंत जैसा है। 300 से अधिक फिल्मों के इस महान अभिनेता ने रोमांस, एक्शन और भावनाओं को एक नई पहचान दी। उनके जीवन, करियर और विरासत पर पढ़िए खास रिपोर्ट।
Dharmendra Death (Image Credit-Social Media)
Dharmendra Death News: बॉलीवुड के जाने-माने एक्टर धर्मेंद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। अपने शानदार करियर में 300 से ज़्यादा फिल्मों में काम करने वाले धर्मेंद्र के साथ न सिर्फ बॉलीवुड बल्कि भारतीय सिनेमा के एक युग का समापन हो गया है। एक ऐसा युग जिसमें फिल्मों ने समाज को बदला, रोमांस ने रूप बदला, एक्शन ने परिभाषा बदली। उस युग में एक चेहरा था – धर्मेन्द्र - जो आम आदमी की सादगी और हीरोपन को एक साथ जीता था। खुद धर्मेन्द्र, उनकी फिल्में, उनकी हीरोइनें, उनके यार, उनके समकालीन एक्टर, सब मिलकर एक ऐसा दौर बनाते हैं जहाँ पर्दे पर जीवन चलता था और जीवन पर्दे पर उतर आता था।
पंजाब के एक गांव से आए एक युवक, जिसका बॉलीवुड में कोई गॉडफादर नहीं था, उसने हिंदी सिनेमा को एक दिशा ही दे डाली, 300 से ज़्यादा फिल्मों में काम किया। धर्मेंद्र उन कुछ एक्टर्स में से थे जिनके स्टारडम पर राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के आने का कोई असर नहीं पड़ा। धर्मेंद्र की कहानी वह कहानी है जिससे सपने और फिल्में बनती हैं। एक फिल्म मैगजीन द्वारा आयोजित राष्ट्रीय प्रतिभा प्रतियोगिता जीतने के बाद धर्मेन्द्र की फिल्मी महत्वाकांक्षाओं ने उड़ान भरी। पंजाब का ये सुंदर युवक बम्बई आ गया और 1960 में ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ से हिंदी फिल्मों में अपनी शुरुआत की। फिल्म चली नहीं और इस पर किसी का ध्यान नहीं गया और अगले साल ही उन्हें अपनी पहली सफलता, शोला और शबनम मिली। इसके बाद उन्होंने मोहन कुमार की अनपढ़ (1962), और बिमल रॉय की बंदिनी (1963) में काम किया, जिसने हिंदी में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता। ‘फूल और पत्थर’ में उनका पहला एक्शन रोल था, और उनकी एक्शन-हीरो वाली इमेज ने ही उन्हें ‘बॉलीवुड का ही-मैन’ का टाइटल दिया। उनकी मुस्कान में पंजाब की मिट्टी की खुशबू थी, आँखों में इश्क़ की शरारत, और कंधों पर एक आम भारतीय मर्द की चुपचाप संघर्ष करती जिम्मेदारियाँ। उनके जाने से जो खालीपन पैदा हुआ है, वह केवल पर्दे पर नहीं, बल्कि उन कहानियों में भी महसूस होता है जो समाज की धड़कनों में जीती थीं।
हीरोइनों के साथ केमिस्ट्री
कई सुपरस्टारों की लोकप्रियता उनकी ‘ऑन-स्क्रीन जोड़ी’ पर टिकती है, और धर्मेन्द्र के साथी भी ऐसा ही था। धर्मेन्द्र की सबसे दमदार जोड़ी हेमा मालिनी के साथ बनी जिसने ‘शोले’, ‘सीता और गीता’, ‘राजा जानी’, ‘ड्रीम गर्ल’ और ‘चरस’ जैसी ब्लॉकबस्टर फ़िल्में दीं। दरअसल, धर्मेन्द्र और हेमा की केमिस्ट्री पर्दे पर सिर्फ रोमांस नहीं थी बल्कि वह उस दौर की दर्शकों की धड़कन थी। उनका ऑफ-स्क्रीन रिश्ता और बाद में शादी भी लंबे समय तक सुर्खियों में रही।
धर्मेन्द्र ने अपने करियर की शुरुआत में मीना कुमारी के साथ कई फिल्में कीं जिनमें ‘फूल और पत्थर’ तथा ‘बहारेँ फिर भी आएँगी’ का नाम हमेशा लिया जाएगा। सच्चाए तो ये है कि मीना कुमारी ने ही धर्मेन्द्र को एक्टिंग की बारीकी, कैमरे की भाषा और भावनाओं की सच्चाई सिखाई। फिल्म इंडस्ट्री की चर्चाओं में यह रिश्ता भी लंबे समय तक चर्चा और विवाद का विषय रहा।
नूतन, माला सिन्हा, आशा पारेख, शर्मिला टैगोर - इन सभी के साथ धर्मेन्द्र ने रोमांस, ड्रामा, एक्शन, हरा तरह की फिल्में कीं। यह वह दौर था जब स्क्रीन पर भावनाओं की केमेस्ट्री ही स्टारडम बनाती थी, और धर्मेन्द्र की यह खूबी हमेशा कायम रही। इस हीरोइनों के की गईं फ़िल्में उस दौर की नैतिकता, प्रेम और पारिवारिक उलझनों की परतें खोलती हैं।
दोस्ती और प्रतिस्पर्धा
साठ-सत्तर का दशक राजेंद्र कुमार, दिलीप कुमार, राजेश खन्ना और बाद में अमिताभ बच्चन के उभार का दौर था। राजेश खन्ना का रोमांस, अमिताभ बच्चन का उभार, मनोज कुमार का देशभक्ति सिनेमा, शशि कपूर का अर्बन चार्म इन सबकी अलग पहचान थी हर कोई अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहा था लेकिन धर्मेन्द्र ने बिना किसी कैंप, बिना किसी पॉलिटिक्स के अपनी अलग पहचान बना ली। राजेश खन्ना सुपरस्टार थे लेकिन धर्मेन्द्र की लोकप्रियता कम नहीं हुई। इसी तरह जब ‘एंग्री यंग मैन’ आया, तो कई सितारे धुंधला गए लेकिन धर्मेन्द्र अपनी जमीन पर कायम रहे। धर्मेन्द्र और जीतेन्द्र की तो ‘धर्मवीर’ दोस्ती मशहूर थी। कहा जाता है कि करियर के उतार-चढ़ाव दोनों ने एक-दूसरे के साथ साझा किए।
वो फिल्में जिनसे एक पीढ़ी पली-बढ़ी
‘शोले’ का वीरू यानी मस्ती, दोस्ती और रोमांस का फौलादी चेहरा। ‘सीता और गीता’ का वह हल्के-फुल्के अंदाज़ वाला राकेश, जिसने हेमा मालिनी की दोहरी भूमिका के साथ कहानी को गुदगुदाहट दी। ‘चुपके चुपके’ का प्रोफेसर, जहाँ एक्शन हीरो अचानक बौद्धिक कॉमेडी का बादशाह बन गया। ‘प्रतिज्ञा’ का हंसाता किरदार या ‘अनुपमा’, ‘खामोशी’, ‘सत्यकाम,’ ‘फूल और पत्थर’ का संवेदनशील नायक। यहीं धर्मेन्द्र की खासियत दिखती है। वह हर तरह की फिल्म में फिट हो जाते थे, चाहे गुस्सा हो या एक्शन या फिर कोमल अभिव्यक्ति। 1970 के दशक में उन्हें जीवन मृत्यु, तुम हसीन मैं जवान, गुड्डी, यादों की बारात, ब्लैक मेल, प्रतिज्ञा, चुपके चुपके, शोले, ड्रीम गर्ल, धरम वीर, सीता और गीता, ड्रीम गर्ल, द बर्निंग ट्रेन जैसी कुछ सबसे पॉपुलर भूमिकाओं में देखा गया।
एक युग की समाप्ति
धर्मेन्द्र के साथ सिर्फ एक अभिनेता नहीं गया बल्कि एक दौर ख़त्म हुआ है, ऐसा दौर जब रोमांस सादगी से शुरू होता था, जब बिना स्पेशल इफेक्ट्स से एक्शन असली पसीने से बनता था, जब समाज की समस्याएँ फिल्मों की कहानियों में सीधे उतरती थीं और हीरो वही होता था जो भावुक भी हो सकता था, और वीर भी। धर्मेन्द्र वह भारत थे जो गाँव की पगडंडियों से निकलकर शहर की ऊँची इमारतों के बीच भी अपनी मिट्टी की महक नहीं खोता। आज जब चमक-दमक, हाई-टेक एक्शन और ग्लैमर भरे दौर में सिनेमा लगातार बदल रहा है, धर्मेन्द्र का जाना एक ऐसी खामोशी छोड़ता है जो सिर्फ चुप नहीं, ‘यादों की बरात’ है।
- नीलमणि लाल


